Thursday, August 1, 2019

Harishankar Temple History in Balangir Odisha (हरिशंकर मंदिर ओडिशा - बलांगीर )

Harishankar Temple History in Hindi

प्रकृति कि मनोरम वादियों में झरनों कि कलकल कि ध्वनी का आनंद लेना चाहते है तो हरिशंकर पधारे, यहाँ आकर आप प्राकृतिक वातावरण से रूबरू होने का मौका मिलता है| ओडिशा कि पावन धरा पर वैसे अनेक प्राचीन, दैवीय स्थल है | इन्ही में से एक तीर्थ जिसे हरिशंकर कहा जाता है|
Harishankar Temple

Harisankar Temple  Balangir & Gandhamardhan hills

भगवान राम वनवास काल के दौरान माता सीता व भाई लक्ष्मण के साथ यहाँ आये थे, रामके द्वारा भगवान शिव कि आराधना कि झरने के निर्मल जल से शिव का अभिषेक किया तब से यह स्थान हरी शंकर के नाम से विख्यात हुवा , पाण्डव अपने वनवास काल के दौरान कुछ समय यहाँ व्यतीत किये थे ?

Harishankar Mandir


विशाल पर्वत पर हरिशंकर जी का मंदिर है जिसे गंधमादन पर्वत क्षेत्र कहा जाता है, पर्वत से पावन कपिल धारा , पाण्डव धारा ,गुप्त धारा , भीम धारा तथा चाल धारा ये पाच पवित्र जलधारा इस पर्वत कि गोद से निकलती है | इनमे से पांचवी धारा के निचे गोकुण्ड है| कपिल धारा का प्रवाह अति तीव्र है | तथा पाण्डव धारा के पास पर्वत में पाण्डव कि ऊँची प्रतिमा चट्टानों पर बनी है| गुप्त धारा सीता कुण्ड में है| यह कुण्ड चट्टानों में बना है| तथा इसका जल हमेशा गरम रहता है| भीम धारा 40  फुट ऊपर से गिरती है | चाल धारा के निचे अथाह जल है| बांस कि चाल बनाकर इसमें स्नान किया जाता है| तथा गोकुण्ड के आसपास लोग बच्चो के मुंडन का केश प्रवाहित करते है|


harishankar temple And waterfall

इस गंधमादन पर्वत के अगले छोर पर श्री श्री नृसिंहनाथ जी का मंदिर है| पर्वत पर अनेक गुफाये एवं खंडहर विद्यमान है| इस खंडहरों पर कभी बौद्ध भिक्षुक साधना व  तपस्या किया करते थे| इन खण्डहरो को प्राचीन परिमलगिरी विश्वविद्यालय के अवशेष मानते है|

harishankar fall




मंदिर परीक्षेत्र में अनेक वानर विचरण करते रहते है| लोग बड़े ही प्रेम भाव से प्रसाद खिलाते है| एक बहुत बड़े, बाड़े में सैकड़ो कि तादाद में हिरने व बारहसिंघा,व  राष्ट्रिय पक्षी मोर(मयूर)के दुर्लभ दर्शन होते है| लोग यहाँ के जल से जल क्रीडा का लुप्त उठाते है|  


विशेष :- सावन के दौरान शिव भक्त दूर दूर जे जल लाकर भगवान शिव का अभिषेक करते है एवं यहाँ के जल को अन्य शिवालय तक ले जाते है| महाशिवरात्रि को बड़े हर्ष उल्लास के साथ मनाया जाता है|   

कैसे पहुंचे :- जिला मुख्यालय से इसकी दुरी 78 किलोमीटर है| एवं रास्ते पक्की बनी हुई है व नजदीक ही हरिशंकर रेलवे स्टेसन है| नुवापडा जिले से इसकी दुरी महज  62 किलोमीटर है|                   

Saturday, August 4, 2018

Bahubali Gomateshwara Statue Shravanabelagola Karnataka (गोमटेश्वर बाहुबली श्रवणबेलगोला)

दुनिया की सबसे ऊंची अखण्ड  प्रतिमा है बाहुबली की | 

श्रवणबेलगोल कर्नाटक राज्य में दक्षिण-रेल्वे की बंगलोर-हरिहर-पूना लाइन के आरसीकेरे स्टेशन से 67 किमी., मैसूर से 99 किमी., बंगलोर से 164 किमी. और हासन से 49 किमी दूर यह स्थान है ।

Gomateshwara Statue


Sunday, March 18, 2018

Banjari Mata Temple Raipur (बंजारी माता मंदिर रायपुर )

माँ बगुला मुखी ( जिसे बंजारी माता के नाम से जाना जाता है| यह प्रसिद्ध मंदिर रायपुर जिले में स्थित है| रायपुर से बिलासपुर नेशनल हाइवे क्र. 30 पर स्थित है| 
banjari temple,raipur
बंजारी माता 

स्थानीय निवासी के अनुसार माता रानी की प्रतिमा भुगर्भित है| माता स्वयं अपनी इच्छा स्वरुप इस स्थान पर प्रकट हुई है| इसे माँ दुर्गा का अवतार भी कहा जाता है| लोगो के अनुसार पहले यह स्थान बंजर भूमि हुवा करता था| जिसके चलते इस स्थान पर लोगो  का आना जाना न के बराबर हुवा करता था| मगर माता के प्रागट्य स्वरुप  यह स्थान उपजाऊ होने लगा तथा इस स्थान का महत्व बडने लगा|
( माता रानी बंजर भूमि में प्रगटी है| इस कारण माता का नाम बंजारी पड़ा तथा माँ का जो मुख है वह बगुला के मुख के सामान है जिस कारण माता का नाम बगुला मुखी पड़ा ) 
माता का शयन कक्ष 

आज जो वर्तमान मंदिर है वह काफी भव्य व मंदिर परिसर पर नाना प्रकार के सुन्दर मूर्तियों व मंदिरो का निर्माण किया गया है जिस कारण मंदिर की सुन्दरता और भी चार - चाँद हो गयी है| 
शंकर भगवान कि निर्माधीन प्रतिमा  
वैसे तो मंदिर में हमेशा भक्तो का ताता लगा रहता है,मगर साल के दोनों नवरात्रि व दशहरा में काफी भीड़ देखी जा सकती है| नवरात्र के समय भक्तो के द्वारा भारी मात्र में मनोकामना ज्योति जलाई जाती है| 


उज्वल गौ रक्षण केंद्र

मंदिर ट्रस्ट के द्वारा पास में ही गौशाला चलाया जाता है| जिसमे गायो का पालन किया जाता व घायल बीमार गौमाता व अन्य पशुवो का उचित ईलाज किया जाता है|
हनुमान जी कि प्रतिमा 

इस स्थान पर कैसे पहुचे :- यदि आप ट्रेन से आ रहे है तो रेल्वे स्टेशन से इसकी दुरी 8 कि.मी है| और बस स्टैंड  से इसकी दुरी 11 कि.मी है यदि आप प्लेन से आ रहे हो तो स्वामी विवेकानंद एयरपोर्ट से इसकी दुरी 14 कि.मी है| यहाँ पहुचने के लिए नियमित रूप से बस ऑटो अदि चलती रहती है|
                                                                                                             विशेष सहयोग 
                                                                      श्री दुष्यंत साहू  ग्राम - (धनेली)                              
इन्हे भी जरूर देखे :-

Sunday, September 17, 2017

Jagannath Mandir Ke Ajube भगवान जगन्नाथ के मंदिर से जुडी कुछ रोचक तथ्य........

प्रारम्भ से पढ़ें…


मार्ग :-
पूर्वी रेल्वे कि हबड़ा- वाल्टेयर लाइन पर कटक से 29 मील दूर खुदरा-रोड स्टेशन है|वहा से एक लाइन पूरी तक जाती है| खुदरा - रोड पूरी २८ मील है| आसन सोल हबड़ा, मद्रास तथा तलचर से पूरी के लिए सीधी ट्रेने चलती है
jagannath mandir ka history
facts of jagannath temple in hindi

कटक ,भुवनेश्वर,खुदरा – रोड आदि से पूरी के लिए मोटर बसे चलती है पूरी स्टेशन से श्री जगन्नाथ जी का मंदिर लगभग एक मील है|

ठहरने का स्थान :-

पूरी में बहुत से मठ है| प्रायः सभी मठो में यात्री ठहरते है| अनेक धर्मशाला भी है|

पुरी मे जगन्नाथ मंदिर के अजुबेः-

(1) मंदिर के सिखर पर लगा झण्डा हमेसा हवा के निपरीत दिशा मे लहराता है।

(2) पुरी मे किसी भी जगह से आप मंदिर पर लगे सूदर्शन चक्र को देखोगे तो वह आपको सामने कि ओर ही लगा दिखेगा।
facts about jagannath temple(3) जैसे की हम सबको पता है की दिन के समय हवा समुद्र से जमिन की तरफ आति है।और शाम के दौरान ईसके विपरीत लेकिन पुरी मे इसका विपरित होता है।

(4) आप कभी भी किसी पक्षी या विमान को मंदिर के उपर उडते हुवे नहि देखेगे।

(5) मंदिर की मुख्य गुम्बत कि छाया दिन के किसी भी समय दिखाई नही देती।

(6) मंदिर के अंदर प्रसाद पकाने के लिये भोजन की सारी सामग्री पूरे वर्ष के लिये भंडार घर मे रहती है। प्रसाद की एक भी मा़त्रा यानि एक भी कण कभी व्यर्थ नही जाती है।आप चाहे कितने भी लोग वहा जाये प्रसाद आपको जरूर मिलेगा चाहे कुछ हजार लोग हो या लाख प्रसाद सभी लोगो को खिला सकते है।

(7) मंदिर की रसोई घर मे प्रसाद पकाने के लिये 7 बर्तनो को एक दूसरे पर रखा जाता है। और लकडी के जलावन पर पकाया जाता है। ईस प्रकृया मे उपर मे रखी सामग्री पहले पकती है फिर क्रमशः नीचे कि बर्तनो कि सामग्री पकती है।

(8) मंदिर के मुख्य द्वार मे पहला कदम रखने पर सागर(समुद्र) द्वारा उत्पन्न किसी भी तरह कि ध्वनी नही सुनाई देति है। जबकी मंदिर के बाहर सुनाई देती है।

facts of jagannath mandir

मंदिर से जुडी रोचक तथ्य:-

मंदिर कि उचाई 214 फिट है।

मंदिर का क्षेत्रफल चार लाख वर्ग फिट मे फैला है।

प्रतिदिन सायंकाल मंदिर के उपर लगी ध्वजा को मानव द्वारा उल्टा चढ कर बदला जाता है।

मंदिर कि रसोई दुनिया कि सबसे बडी रसोई घर है।
facts about jagannath puri temple in hindi
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विशाल रसोई घर मे भगवान जगन्नाथ को चढाने वाले महाप्रसाद को बनाने 400 रसोईया एवं 200 सहकर्मी काम करते है। 

भगवान श्री जगन्नाथ की कथा - क्यो अपूर्ण निर्मित हुई मुर्तिया .....


                                     कथा:- 

द्वापर में द्वारिका में श्री कृष्णचन्द्र कि पटरानियो ने एक ब़ार माता रोहणी जी के भवन में जाकर उनसे आग्रह किया कि वे उन्हें श्याम सुन्दर कि व्रज-लीला के गोपी- प्रेम प्रसंग को सुनाये| माता ने इस बात को टालने का बहुत प्रयत्न किया; किन्तु पटरानियो के आग्रह के कारण उन्हें वह वर्णन सुनाने को प्रस्तुत होना पड़ा| उचित नहीं था कि सुभद्राजी भी वहा रहे| अत: माता रोहनी ने सुभद्रा जी को भवन के द्वार के बहार खड़े रहने को कहा और आदेश दिया कि वे किसी को भीतर न आने दे| संजोग वश उसी समय श्री कृष्ण – बलराम वहा पधारे| 

सुभद्रा जी ने दोनों भाइयो के मध्य में खड़े होकर अपने दोनों हाथ फैलाकर दोनों को भीतर जाने से रोक दिया| बंद द्वार के भीतर जो व्रज प्रेम कि वार्ता हो रही थी,उसे द्वार के बहार से ही यक्तिचित सुनकर तीनो के ही शरीर द्रवित होने लगे| उसी समय देवर्षि नारद वहा आ गए| देवर्षि ने यह जो प्रेम-द्रवित रूप देखा तो प्राथना कि ‘आप तीनो इसी रूप में विराजमान हो|’श्री कृष्णचंद्र ने स्वीकार किया -‘कलयुग में दारूविग्रह में इसी रूप में हम तीनो स्थित होंगे|’

प्राचीन काल में मालव देश के नरेश इन्द्र्धुमन को पता लगा कि उत्कल प्रदेश में कही नीलाचल पर भगवान नीलमाधव का देवपूजित श्री विग्रह है| वे परमविष्णु भक्त उस श्री विग्रह का दर्शन करने के प्रयत्न में लगे|उन्हें स्थान का पता लग गया; किन्तु वे वहा पहुचे इसके पूर्व ही देवता उस श्री विग्रह को लेकर अपने लोक में चले गए| उसी समय आकाशवाणी हुई कि दारूब्रम्हारूपमें तुम्हे अब श्री जगन्नाथ के दर्शन होंगे |

महाराज इंद्रधुमन सहपरिवार आये थे| वे नीलाचलके पास ही बस गए| एक दिन समुद्र में एक बहुत बड़ा काष्ठ (महादारु)बहकर आया राजा ने उसे निकलवा लिया इससे विष्णु मूर्ति बनवाने का उन्होंने निश्चय किया| उसी समय वृद्ध बढई के रूप में विश्वकर्मा उपस्थित हुवे| उन्होंने मूर्ति बनाना स्वीकार किया; किन्तु यह निश्चय करा लिया कि जबतक वे सूचित न करे,उनका वह गृह खोला न जाय जिसमें वे मूर्ति बनायेंगे|

महादारू को लेकर वे वृद्ध बड़ई गुंडीचा मंदिर के स्थान पर भवन में बंद हो गए| अनेक दिन व्यतीत हो गए| महारानी आग्रह प्रारम्भ किया –‘इतने दिनों में वह वृद्ध मूर्तिकार अवश्य भूख-प्यास से मर गया होगा या 


मरणासन्न होगा| भवन का द्वार खोलकर उसकी अवस्था देख लेनी चाहिए |’महाराज ने द्वार खुलवाया| बड़ई तो अदृश्य हो चूका था; किन्तु वहा श्री जगन्नाथ,सुभद्रा तथा बलरामजी कि असम्पूर्ण प्रतिमाऐ मिली| राजा को बड़ा दुःख हुवा मुर्तियो के सम्पूर्ण न होने से!, किन्तु उसी समय आकाशवाणी हुई –‘चिंता मत करो !इसी रूप में रहने कि हमारी इच्छा है| मुर्तियो पर पवित्र द्रव्य (रंग आदि )चढाकर उन्हें प्रतिष्ठित कर दो ! इस आकाशवानी के अनुसार वे ही मुर्तिया प्रतिष्ठित हुई | गुंडीचा मंदिर के पास मूर्ति निर्माण हुवा था,अत गुंडीचा मंदिर को ब्रम्हालोक या जनक पुर कहते है|

द्वारिका में एक ब़ार श्री सुभद्रा जी ने नगर देखना चाहा| श्री कृष्ण तथा बलरामजी उन्हें पृथक रथ में बैठाकर ,अपने रथो के मध्य उनका रथ करके उन्हें नगर-दर्शन कराने ले गए|इसी घटना के स्मारक –रूप में यहाँ रथ यात्रा निकलती है|


उत्कल में ‘दुर्गा-माधव-पूजा’एक विशेष पद्धति ही है| अन्य किसी प्रान्त में ऐसी पद्धति नही है| इसी पद्धति के अनुसार श्री जगन्नाथ को भोग लगा नैवेध्य विमला-देवी को भोग लगता है और तब वह महाप्रसाद माना जाता है|

पूरीधाम के अन्य मंदिर :-
(1) गुंडीचा मंदिर
(2) कपालमोचन
(3) एमार मठ
(4) गंभीराम मठ(श्री राधाकान्त मठ)
(5) सिद्धबकुल
(6) गोवर्धन पीठ (शंकराचार्य मठ)
(7) कबीर मठ
(8) हरीदास जी कि समाधी
(9) तोटा गोपीनाथ
(10) लोकनाथ
(11) बेडी-हनुमान
(12) चक्रतीर्थ और चक्रनारायण
(13) सोनार गौराग्ड
(14) कानवत हनुमान

                                                             जारी है ……

Saturday, September 16, 2017

Jagannath Temple, Puri - Odisha (श्री जगन्नाथ मंदिर,पुरी - ओड़िशा )

श्री जगन्नाथ चार परम पावन धामों मे एक है| ऐसी भी मान्यत है कि शेष तीन धामों में बद्रीनाथ सतयुग का, रामेश्वर त्रेता का तथा द्वारिका द्वापर का धाम है; किन्तु इस कलयुग का पावनकारी धाम तो पूरी ही है|
Jagannath Temple, Puri - Odisha

पहले यहाँ नीलाचल नामक पर्वत था और नीलमाधव- भगवान कि श्री मूर्ति थी उस पर्वत पर जिसकी देवता आराधना करते थे| वह पर्वत भूमि में चला गया और भगवान की वह मूर्ति देवता अपने लोक मे ले गए; किन्तु इस क्षेत्र को उन्ही कि स्मृति में अब भी नीलाचल कहते है| श्री जगन्नाथ जी के मंदिर के शिखर पर लगा चक्र ‘नीलछत्र’ कहा जाता है| उस नीलछत्र के दर्शन जहा तक होते है, वह पूरा क्षेत्र श्री जगन्नाथपूरी है|

इस क्षेत्र के अन्य अनेक नाम है| 
यह श्री क्षेत्र पुरुषोत्तम पूरी तथा शंखक्षेत्र भी कहा जाता है; क्युंकी इस पूरे पुण्यक्षेत्र कि आकृति शंख के सामान है| शाक्त इसे उद्द्यानपीठ कहते है 51 शक्ति पीठो में यह एक पीठ स्थल है|सती की नाभी यहाँ गिरी थी|

श्री जगन्नाथजी के महाप्रसाद कि महिमा तो भुवन विख्यात है| महाप्रसाद में छुवा छूत का दोष तो माना ही नहीं जाता, उित्छष्टीता दोष भी नहीं माना जाता और व्रत पर्वदिन के दिन भी उसे ग्रहण करना विहित है| 

सच तो यह है कि भगवतप्रसाद अन्न या पदार्थ नहीं हुवा करता| वह तो चिन्मय तत्व है| उसे पदार्थ मानकर विचार करना ही दोष है| श्री वल्लभाचार्य महाप्रभु पुरी पधारे तो एकादशी-व्रत के दिन उसकी निष्ठा कि परीक्षा के लिए उनको किसी ने मंदिर में ही महाप्रसाद दे दिया | आचार्य ने महाप्रसाद हाथ में लेकर उसका स्तवन प्रारंभ किया और एकादशी के पुरे दिन तथा रात्रि उसका स्तवन करते रहे| दुसरे दिन द्वादशी में स्तवन समाप्त करके उन्होंने प्रसाद ग्रहण किया इस| प्रकार उन्होंने महाप्रसाद एवम एकादशी दोनों को समुचित आदर दिया|

श्री जगन्नाथ मंदिर :-
श्री जगन्नाथ जी का मंदिर बहुत विशाल है | मंदिर दो परकोटो के भीतर है| इनमे चारो ओर चार महाद्वार है| मुख्य मंदिर के तीन भाग है-विमान या श्री मंदिर जो सबसे उचा है; इसीमें श्री जगन्नाथ जी विराजमान है| उसके सामने जगमोहन है और जगमोहन के पश्चात मुखशाला नामक मंदिर है| मुखशाला के आगे भोगमण्डप है|
श्री जगन्नाथ मंदिर के पूर्व में सिंह द्वार,दक्षिण में अश्व द्वार ,पश्चिम में व्याघ्रद्वार और उत्तर में हस्ती द्वार है|

निज मंदिर के घेरे के मंदिर :-
सिंह द्वार के सम्मुख कोणार्क से लाकर स्थापित किया उच्च अरुण स्तम्भ है| इसकी परिक्रमा करके सिंह द्वार को प्रणाम करके द्वार में प्रवेश करने पर दाहिनी ओर पतित पावन जगन्नाथ जी के विग्रह(द्वार में ही ) दृष्टीगोचर होते है| इनके दर्शन सभी के लिए सुलभ है| विधर्मी भी इनका दर्शन कर सकते है|

आगे एक छोटी मंदिर में विश्वनाथ लिंग है| कोई ब्राम्हण काशी जाना चाहते थे| श्री जगन्नाथ जी ने उन्हें स्वप्न में आदेश दिया कि उक्त लिंगमूर्ति के अर्चन से ही उन्हें विश्वनाथ जी के पूजन का फल प्राप्त हो जायेगा|

श्री जगन्नाथ जी के मंदिर के दुसरे प्राकार के भीतर जाने से पूर्व २५ सीढी चड़ना पड़ता है| इन सीढियों को प्राकृति के २५ विभागो का प्रतिक माना गया है| द्वीतीय प्रकार के द्वार में प्रवेश करने के पूर्व दोनों ओर भगवत प्रसाद का बाज़ार दिखायी देता है|

आगे अजाननाथ गणेश ,बटेरा महादेव एवम पटमंगला देवी के स्थान है| सत्यनारायण – भगवान है| इसकी सेवा अन्यधर्मी भी करते है| आगे वट वृक्ष है ,जिसे कल्प वृक्ष कहते है| उसके नीचे बालमुकुन्द (वटपत्रशायी) के दर्शन है| वट वृक्ष कि परिक्रमा कि जाती है| वहा से आगे गणेश जी का मंदिर है| इन्हें सिद्ध गणेश कहते है | पास सर्वमंगला देवी तथा अन्य देवी मंदिर है|
Jagannath Mandir, Puri

श्री जगन्नाथजी के निज मंदिर के द्वार के सामने मुक्ती मण्डप है| इसे ब्रम्हासन कहते है| ब्रम्हाजी पूर्व काल में यज्ञ के प्रधानाचार्य होकर यही विराजमान होते थे| इस मुक्तीमण्डप में स्थानीय विद्वान ब्राम्हण के बैठने कि परिपाटी है|

मुक्तीमण्डप के पीछे कि ओर मुक्तनृसिंह का मंदिर है| ये यहाँ के क्षेत्रपाल है| इस मंदिर के पास ही रोहानी कुण्ड है| उसके समीप ही विमलादेवी का मंदिर है| यह यहाँ का शक्ति पीठ है| जैन लोग इस विग्रह का सरस्वती नाम से पूजन करते है|
रात में मुख्य द्वार -पुरी 

यहाँ से आगे सरस्वती जी का मंदिर है| सरस्वती तथा लक्ष्मी जी के मंदिर के बीच में नीलमाधव जी का मंदिर है| यही कुर्मबेढा में श्री जगन्नाथ जी का अन्य छोटा मंदिर है| समीप ही काक्षीगणेश कि मूर्ति है| आगे भुनेश्वरी देवी का मंदिर है| उत्कल के शाक्त आराधकोकी ये आराध्या है|

वहा से आगे श्री लक्ष्मी जी का मंदिर है| इन मंदिरों में श्री लक्ष्मीजी कि मुख्यमूर्ति है| समीप ही श्री शंकराचार्य जी तथा लक्ष्मीनारायण मुर्तिया है| इसी मंदिर के जगमोहन में कथा तथा अन्य शास्त्र चर्चा होती है|


श्री लक्ष्मी जी के मंदिर के समीप सूर्य मंदिर है| मंदिर में सूर्य,चन्द्र तथा इंद्र कि छोटी-छोटी मुर्तिया है| कोणार्क- मंदिर से लायी हुई सूर्य भगवान कि प्रतिमा इसी मंदिर में गुप्त स्थान में रखी गयी है|

पास में पातालेश्वर महादेव का सुन्दर मंदिर है| इनका महात्म बहुत माना जाता है| यही उत्तरमणि देवी कि मूर्ति है| यहाँ से पास ही ईशानेश्वर मंदिर है| इनको श्री जगन्नाथ जी का मामा कहते है| इस लिंग विग्रह के सम्मुख जो नंदी कि मूर्ति है, उससे गुप्तगंगा का प्रवाह निकला है| वहा नख से आघात करने से जल निकल आता है|

यहाँ से आगे निज मंदिर से एक द्वार बहार जाता है| इस द्वार को बैकुण्ठ द्वार कहते है| वैकुण्ठ द्वार के समीप वैकुंठेश्वर महादेव का मंदिर है| यहाँ बगीचा-सा है|बारह वर्ष पर जब श्री जगन्नाथजी का कलेवर-परिवर्तन होता है,तब पुराने विग्रह को यही समाधी दी जाती है|

जय विजय द्वार में जय विजय कि मुर्तिया है| इसका दर्शन करके,इनसे अनुमति लेकर तब निज मंदिर में जाना उचित है| इसी द्वार के समीप श्री जगन्नाथ जी का भंडार घर है|    जारी है … आगे पढें

इन्हे भी देखे :- 

Konark Sun Temple , Odisha (कोर्णाक सूर्य मंदिर-ओडिशा-भारत)

ओडिशा के पावन धरा पर पुरी क्षेत्र के समुद्र किनारे विशाल व विश्व विख्यात सुर्य मंदिर स्थीत है। ईस मंदिर मे सूर्य कि पहली किरण मंदिर के गर्भ गृह मे स्थीत सूर्य कि प्रतिमा पर पडती थी 
Odisha,Konark Sun Temple

konark Mandir

Konark Sun Temple

Konark Sun Temple,india

ईस मंदिर के अंदर चुम्बक लगी थी जिसकी मदद से यहा कभी सैकडो टन प्रतिमा हवा मे तैरा करती थी मंदिर के शिखर पर लगे चुम्बक पत्थर कि वजय से मंदिर के समिप समुद्र के किनारे जाने वाले जहाजो का कम्पास फेल हो जाता था और गलत दिशा बताता था जिसकी वजय से जहाज दूर्घटना का शिकार हो जाते


Konark odisha

जिस कारण पुर्तगालियो को भारी नुकसान उठाना पडता था पुर्तगालियो ने ईसका राज का पता लगा लिया और मंदिर के शिखर पर लगे चुम्बक को चोरी कर ले गये और बंगाल के सुल्तान सुलेमान खान कर्रानी जिसे काला पहाड भी कहा जाता है जिसने ईस मंदिर को बार बार लूटा भारी नुकसान पहुचाया गया मंदिर की मुर्तिया खजाने को चोरि कर ले गये शिखर को बारूद से उडा दिया जैसे हि शिखर गिरा मुख्य मंदिर टूट गया क्योकि मंदिर का प्राण उसके शिखर पर था (पुरी के पंडितो ने यहा कि मुख्य प्रतिमा को पवित्र बनाये रखने के लिये बालू मे दबा दिया )आज यह प्रतिमा पुरी के जगन्नाथ मंदिर मे है।

कोर्णाक का सूर्य मंदिर जिसे अग्रेजी मे ब्लैग पगोडा भी गया है।

ईसे लाल बलुवा पत्थर और काले ग्रेनाई पत्थर से 1236 - 1234 ई पू मे गंग वंश के राजा नृसिहदेव बनाया गया था।

यह मंदिर भारत के सबसे प्रसिध्द स्थलो मे से एक है।
ईसे सन 1974 मे युनेस्को द्वारा विश्व धरोहर घोषित किया गया है।

कलिग शैलि मे निर्मत यह मंदिर सूर्य देव (अर्क) के रथ के रूप मे निर्मित है।

इस स्थान पर श्री कृष्ण भगवान के पुत्र साम्भ ने सुर्य की कडी तपस्या कर कोड रोग से मुक्ती प्राप्त किया था।
सूर्य के काल्पनिक रथ के समान इस मंदिर कि आकृती है।

Konark Sun Temple

konark


12 एकड मे फैला यह मंदिर जिसको बनाने मे 1200 सौ मजदूर व 12वर्ष मे यह मंदिर का निर्माण किया था।

ईस मंदिर का मुख्य वास्तु कार विशु मोहराना था। उसके 12 वर्ष के पुत्र धर्मपथ मोहराना ने ईस मंदिर के शिखर पर 250 टन का चुम्बक लगाया था। और वहा से कुदकर अपनि जान दि थी।
ईस मंदिर के पिछे सुर्य की पत्नी संध्या और छाया की मंदिर बनि हूई है।
संपूर्ण मंदिर स्थल को एक बारह जोडि चक्रो वाले सात घोडो से खीचे जाते सूर्य देव के रथ के रूप मे बनाया गया है मंदिर की संरचना जो सूर्य के सात घोडो द्वारा दिव्य रथ को खिचने पर आधारित है।
Konark Sun odisha

 अब ईनमे से एक हि घोडा बचा है। इस रथ की पहिये जो कोर्णाक कि पहचान बन गये है। बारह चक्र साल के बारह महिने को प्रतिबिंबित करते है जबकि प्रत्येेक चक्र आठ अरो से मिल कर बना है जो दिन के आठ पहरो को दर्शाते है। जिसमे सटिक समय का पता लगाया जाता है।ईस
मंदिर मे विषाल से विषाल ढाचा और महिन से महिन नक्कासी मंदिर के ईन्च ईन्च मे देखने को मिलति है।

ईस मंदिर मे सूर्य देव कि तीन प्रतिमा है।
(1) बाल्यकाल -उदित सूर्य
(2) युवावस्था- मघ्यान सूर्य
(3) प्रौढपस्था- अस्त सूर्य

ईसके प्रवेष द्वार पर दो सिह हाथियो पर आक्रमन होते हूवे रक्षा मे तत्पर दिखाई देते है।

singh in konark

यह कोर्णाक मंदिर वास्तु दोष के कारण मात्र 700 वर्षो मे हि ध्वस्त हो गया इसके अवषेष को एक संग्रालय मे सजो के रखा गया है।

Wednesday, January 25, 2017

Nrusinghanath Temple Odisha ( नृसिंहनाथ मन्दिर ओड़िशा )

Nrusinghanath Temple Odisha  नृसिंहनाथ मन्दिर ओड़िशा

ओड़िशा कि पावन धरा पर वैसे तो अनेक प्रसिद्ध मंदिर तीर्थ स्थल है मगर नरसिंह क्षेत्र का अपना हि एक विशेष महत्व रखता है|  यहा पर साल भर देश विदेश से लोग इस पावन धरा  पर पहुचते है प्रकृति कि गोद में विराजमान गंध मादन पर्वत पर  दुर्लभ जड़ी बूटी कि खदान मौजूद है|  यहाँ के घने जंगल, कपिल धारा के झरने देखने योग्य है जो  सभी सैलानी को अपनी ओर आकर्षित करती  है|
Nrusinghanath Temple Odisha
मुख्य द्वार 

यहाँ पर कैसे पहुचे :-
पूर्वी रेल्वे कि रायपुर -विजयानगरम लाईन पर रायपुर से महज़ ७३ मील दूर नवापारा रोड़ स्टेशन है | वहा से २२ मील पर यह तीर्थ है | नवापारा से पाइकमाल तक बस -सर्विस है | आगे केवल देड मील मार्ग रह जाता है | यहाँ धर्मशाला है|  यहाँ मुख्य मंदिर श्री नृसिंह-भगवान है | उसके अतिरिक यहाँ शंकर जी और जगन्नाथ जी का भी मंदिर है | वैशाख पूर्णिमा को यह मेला लगता है जिसमे विशाल जन समुदाय  को देखा जा सकता है|  इस स्थान पर अनेक प्राचीन मंदिर मुर्तिया विद्यमान है| जल धारा के किनारे चट्टानों पर तरासे देवतावो कि प्रतिमा अदभुद है|  

Kapil Dhara
कपिल धारा 

कपिल धारा कि दूरी :-
मंदिर परिसर से ३ से ४ कि मी कि दूरी पर घने पहाड़ो के उपर यह जल धारा है मोटर सायकल या पैदल चलकर यहाँ पंहुचा जा सकता है उसकी जल धारा देखने योग्य है उपर पहाड़ कि छोटी से निर्मल जल कि धारा गिरती रहती है जो कभी भी बंद नहीं होती है, उसमे अपार जल भंडार है और उसी जल में भक्त जन स्नान आदि कार्य करते है|
Nrusinghanath Temple Odisha


वानर राज (लाल मुख  वाले बन्दर )से कोई छेड़छाड़ नहीं करना चाइये घुसैले स्वाभाव होने के कारण  नुकसान पंहुचा सकता सकता है|  यदि उसको कुछ खाने को नहीं दिया गया तो वो भोजन सामान को छीण कर भी भाग जाते है| थोडा सावधान होकर रहना चाइये ,बाकी वानर  के होने से यहा कि रौनकत और अधिक बड जाती है।
Nrusinghanath Temple Odisha

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यहाँ  पहाड़ी के रास्ते हरिशंकर भी जाया जाता है मगर रास्ता थोडा कठिन है| इस स्थान से  पतोरा बाध  काफी नजदिक है| योगेश्वर शिव मंदिर राम मंदिर राजीव उद्यान  देखने योग्य है|