Thursday, September 28, 2017

Dhaskud Waterfall,Borid ,Sirpur-Mahasamund (धसकुड़ झरना बोरिद- सिरपुर -महासमुंद)

धसकुड़ झरना सिरपुर से 8 किमी की दुरी पर बोरिद गांव के घने जंगल में स्थित धसकुड़ में जहां पर मनोहारी झरना है। यहां प्रकृति का सौंदर्य देखते ही बनता है। यहां का जलप्रपात बरसाती पानी से बनता है| तथा  गर्मी के दिनों में इसका जल बहुत धीमी हो जाती है|  
Dhaskud Waterfall,sirpur
Dhaskud Waterfall Borid -Sirpur

पठार के ऊपर एक वट वृक्ष है| जिसमे एक चिमटा लगा हुवा है स्थानीय लोगो के अनुसार यह चिमटा किसने लगाया है उसके बारे में किसी को पता नहीं है| उसकी बड़ी श्रद्धा के साथ पूजा करते है अब तो उस स्थान पर ग्राम वासी नवरात्रि में मनोकामना ज्योति जलाते है भक्तो का आना जाना बना रहता है| 

यही बोरिद ग्राम से प्रसिद्ध चांदा दाई (गोड़ गुफा )जिसे कुछ लोग नागार्जुन गुफा भी कहते है वहा जाया जाता है मगर रास्ते  दुर्गम है बहुत से नालो को पार कर उस स्थान में पंहुचा जाता है|
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Wednesday, September 27, 2017

Turturiya -Valmiki Ashram,Luv Kush-Birth Place(तुरतुरिया -वाल्मीकि आश्रम एवं लवकुश की जन्मभूमि)

यह एक ऐतिहासिक स्थल है। यह स्थान पाहाडो के बिच मे है। जिसमे महर्षि वाल्मीकि तथा श्री राम-लक्ष्मण की मुर्तियां है। उसके सामने एक मंदिर मे लव-कुश की युगल मूर्ति है। वहि पर्वत के उपर एक मंदिर मे वाल्मीकि मुनि तथा सीता जी की मूर्तिया है।

luv kush turturiya
गोमुख -तुरतुरिया 

 किन्तू पर्वत हिंसक पशुओ का भय होने से कम लोग ही जाते है।
मंदिर के पास पर्वत पर एक गोमुख बना है।उससे जल निकलता रहता है। ईस जल से बने नाले को लोग सुरसुरी नदि कहते है। गोमूख के जल श्रोत से तुरतुर की आवाज निकलती रहती है। जिस कारण यह स्थान का नाम तुरतुरिया पडा। गोमूख के पास प्राचिन विष्णु कि दो प्रतिमाये है। और एक शिवलिग भी हैै। यहा पर बौध विहार के अवषेश इस स्थान पर है। प्रतिमाये खण्डित अवस्था मे है। यहा पर अनेक प्राचिन प्रतिमाये देखने को मिलती है।
Valmiki Ashram Turturiya
महर्षि वाल्मीकि  आश्रम -तुरतुरिया 

यहा पर नवरात्री मे भक्तो द्वारा भारी मा़त्रा मे मनोकामना ज्योति जलाये जाति है।मंदिर समिती के द्वारा भण्डारे का आयोजन किया जाता है। यह क्षेत्र को परम पावन व मोक्क्ष दायिनी धाम कहा जाता है। क्योकि इस स्थान पर आदि शक्तिी मां सीता का निवास स्थान था। और परम प्रतापी भगवान राम के पुत्र लव कुश कि जन्म स्थिली है यहि उसने विद्या प्राप्त किया था।
turturiya luv kush
लव -कुश की प्रतिमा 


कथा:- तुरतुरिया के बारे मे कहा जाता है। कि भगवान श्री राम द्वारा परित्याग करने पर वैदेहि सीता को फिगेश्वर के समिप सोरिद अंचल ग्राम के(रमई पाठ )मे छोड गये थे वहि माता का निवास स्थान था सिता कि प्रतिमा आज भी उस स्थान पर है। जब मां सिता के बारे मे महर्षि वालमिकी को पता चला तो माता को अपने साथ तुरतुरिया ले आये और सिता मां यहि आश्रम मे निवास करने लगि वहि लव कुश का जन्म हूवा। 
luv kush Birth Place
माता गढ़ 

ram laxman sita-turturiya
राम लक्ष्मण 



turturiya in chhattisgarh
बुद्ध प्रतिमा 
कैसे पहुचे:- यह सिरपुर से मात्र 35 कि मी कि दूरि पर स्थीत है।यह बलौदा बाजार जिले के लवन परिश्रेत्र के विकासखण्ड कसडोल मे आता है। रायपुर से इसकी दुरी लगभग 140 कि मी के आस पास है।रास्ते पक्की बनि हूई है मगर आश्रम से 5  कि मी के पहले रास्ते कच्ची है और काफि घुमावदार है।यदि तुरतुरिया आना है। तो सुबह आना उचित रहता रास्ते दुर्गम है। साम के समय जंगलि जानवर निकलने का डर बना रहता है।  
यहा पर प्रतिवर्ष पौस पुन्नीमा को विषाल मेला लगता है। जिसमे भारी मात्रा मे जन सैलाब उमडता है। जो देखने लायक रहता है।  
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Sunday, September 17, 2017

Jagannath Mandir Ke Ajube भगवान जगन्नाथ के मंदिर से जुडी कुछ रोचक तथ्य........

प्रारम्भ से पढ़ें…


मार्ग :-
पूर्वी रेल्वे कि हबड़ा- वाल्टेयर लाइन पर कटक से 29 मील दूर खुदरा-रोड स्टेशन है|वहा से एक लाइन पूरी तक जाती है| खुदरा - रोड पूरी २८ मील है| आसन सोल हबड़ा, मद्रास तथा तलचर से पूरी के लिए सीधी ट्रेने चलती है
jagannath mandir ka history
facts of jagannath temple in hindi

कटक ,भुवनेश्वर,खुदरा – रोड आदि से पूरी के लिए मोटर बसे चलती है पूरी स्टेशन से श्री जगन्नाथ जी का मंदिर लगभग एक मील है|

ठहरने का स्थान :-

पूरी में बहुत से मठ है| प्रायः सभी मठो में यात्री ठहरते है| अनेक धर्मशाला भी है|

पुरी मे जगन्नाथ मंदिर के अजुबेः-

(1) मंदिर के सिखर पर लगा झण्डा हमेसा हवा के निपरीत दिशा मे लहराता है।

(2) पुरी मे किसी भी जगह से आप मंदिर पर लगे सूदर्शन चक्र को देखोगे तो वह आपको सामने कि ओर ही लगा दिखेगा।
facts about jagannath temple(3) जैसे की हम सबको पता है की दिन के समय हवा समुद्र से जमिन की तरफ आति है।और शाम के दौरान ईसके विपरीत लेकिन पुरी मे इसका विपरित होता है।

(4) आप कभी भी किसी पक्षी या विमान को मंदिर के उपर उडते हुवे नहि देखेगे।

(5) मंदिर की मुख्य गुम्बत कि छाया दिन के किसी भी समय दिखाई नही देती।

(6) मंदिर के अंदर प्रसाद पकाने के लिये भोजन की सारी सामग्री पूरे वर्ष के लिये भंडार घर मे रहती है। प्रसाद की एक भी मा़त्रा यानि एक भी कण कभी व्यर्थ नही जाती है।आप चाहे कितने भी लोग वहा जाये प्रसाद आपको जरूर मिलेगा चाहे कुछ हजार लोग हो या लाख प्रसाद सभी लोगो को खिला सकते है।

(7) मंदिर की रसोई घर मे प्रसाद पकाने के लिये 7 बर्तनो को एक दूसरे पर रखा जाता है। और लकडी के जलावन पर पकाया जाता है। ईस प्रकृया मे उपर मे रखी सामग्री पहले पकती है फिर क्रमशः नीचे कि बर्तनो कि सामग्री पकती है।

(8) मंदिर के मुख्य द्वार मे पहला कदम रखने पर सागर(समुद्र) द्वारा उत्पन्न किसी भी तरह कि ध्वनी नही सुनाई देति है। जबकी मंदिर के बाहर सुनाई देती है।

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मंदिर से जुडी रोचक तथ्य:-

मंदिर कि उचाई 214 फिट है।

मंदिर का क्षेत्रफल चार लाख वर्ग फिट मे फैला है।

प्रतिदिन सायंकाल मंदिर के उपर लगी ध्वजा को मानव द्वारा उल्टा चढ कर बदला जाता है।

मंदिर कि रसोई दुनिया कि सबसे बडी रसोई घर है।
facts about jagannath puri temple in hindi
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विशाल रसोई घर मे भगवान जगन्नाथ को चढाने वाले महाप्रसाद को बनाने 400 रसोईया एवं 200 सहकर्मी काम करते है। 

श्री जगन्नाथ पुरी में स्नान के स्थान :-

                                                        श्री जगन्नाथ पुरी स्नान के स्थान :-



श्री जगन्नाथ पुरी में १ – महोदधि (समुद्र ),

२- रोहणी कुण्ड-कुण्ड ,

३- इन्द्र्धुमन सरोवर ,

४ – मर्कंदय सरोवर

५ -  श्वेत गंगा

६ - चन्दन तालाब,

७  - लोकनाथसरोवर ,

८ – चक्रतीर्थ – ये आठ पवित्र जल तीर्थ है|


१ – श्री जगन्नाथ जी के मंदिर से सीधा मार्ग समुद्र तट को गया है| स्नान का स्थान स्वर्गद्वार कहा जाता है| श्री जगन्नाथ मंदिर से स्वर्ग द्वार लगभग एक मील है|

२ – रोहानी कुण्ड –यह कुण्ड श्री जगन्नाथ मंदिर के भीतर ही है इसमें सुदर्सनचक्र कि छाया पड़ती है | कहा जाता है कि एक कौवा अकस्मात् इसमें गिर पड़ा , इससे उसे सारुप्य – मुक्ती प्राप्त हुई |

३ – इन्द्र्धुमन सरोवर मंदिर से लगभग देड मील पर गुंडीचामंदिर (जनक पुर )के पास है|

४-५ –मरकंडय सरोवर और चन्दन तालाब – ये दोनों ही पास –पास है | श्री जगन्नाथ जी के मंदिर से आधा मील दूर है|


६- श्वेत गंगा सरोवर स्वर्ग द्वार (समुद्रस्नान) के मार्ग में है|

७- श्री लोकनाथ मंदिर के पास लोकनाथ सरोवर है| जगन्नाथ जी के मंदिर से लगभग दो मील है| इसे हर – पार्वती-सर या शिवगंगा भी कहते है|

८- चक्रतीर्थ स्टेशन से आधा मील पर समुद्र तट पर है|
                                                                                           जारी है ……

भगवान श्री जगन्नाथ की कथा - क्यो अपूर्ण निर्मित हुई मुर्तिया .....


                                     कथा:- 

द्वापर में द्वारिका में श्री कृष्णचन्द्र कि पटरानियो ने एक ब़ार माता रोहणी जी के भवन में जाकर उनसे आग्रह किया कि वे उन्हें श्याम सुन्दर कि व्रज-लीला के गोपी- प्रेम प्रसंग को सुनाये| माता ने इस बात को टालने का बहुत प्रयत्न किया; किन्तु पटरानियो के आग्रह के कारण उन्हें वह वर्णन सुनाने को प्रस्तुत होना पड़ा| उचित नहीं था कि सुभद्राजी भी वहा रहे| अत: माता रोहनी ने सुभद्रा जी को भवन के द्वार के बहार खड़े रहने को कहा और आदेश दिया कि वे किसी को भीतर न आने दे| संजोग वश उसी समय श्री कृष्ण – बलराम वहा पधारे| 

सुभद्रा जी ने दोनों भाइयो के मध्य में खड़े होकर अपने दोनों हाथ फैलाकर दोनों को भीतर जाने से रोक दिया| बंद द्वार के भीतर जो व्रज प्रेम कि वार्ता हो रही थी,उसे द्वार के बहार से ही यक्तिचित सुनकर तीनो के ही शरीर द्रवित होने लगे| उसी समय देवर्षि नारद वहा आ गए| देवर्षि ने यह जो प्रेम-द्रवित रूप देखा तो प्राथना कि ‘आप तीनो इसी रूप में विराजमान हो|’श्री कृष्णचंद्र ने स्वीकार किया -‘कलयुग में दारूविग्रह में इसी रूप में हम तीनो स्थित होंगे|’

प्राचीन काल में मालव देश के नरेश इन्द्र्धुमन को पता लगा कि उत्कल प्रदेश में कही नीलाचल पर भगवान नीलमाधव का देवपूजित श्री विग्रह है| वे परमविष्णु भक्त उस श्री विग्रह का दर्शन करने के प्रयत्न में लगे|उन्हें स्थान का पता लग गया; किन्तु वे वहा पहुचे इसके पूर्व ही देवता उस श्री विग्रह को लेकर अपने लोक में चले गए| उसी समय आकाशवाणी हुई कि दारूब्रम्हारूपमें तुम्हे अब श्री जगन्नाथ के दर्शन होंगे |

महाराज इंद्रधुमन सहपरिवार आये थे| वे नीलाचलके पास ही बस गए| एक दिन समुद्र में एक बहुत बड़ा काष्ठ (महादारु)बहकर आया राजा ने उसे निकलवा लिया इससे विष्णु मूर्ति बनवाने का उन्होंने निश्चय किया| उसी समय वृद्ध बढई के रूप में विश्वकर्मा उपस्थित हुवे| उन्होंने मूर्ति बनाना स्वीकार किया; किन्तु यह निश्चय करा लिया कि जबतक वे सूचित न करे,उनका वह गृह खोला न जाय जिसमें वे मूर्ति बनायेंगे|

महादारू को लेकर वे वृद्ध बड़ई गुंडीचा मंदिर के स्थान पर भवन में बंद हो गए| अनेक दिन व्यतीत हो गए| महारानी आग्रह प्रारम्भ किया –‘इतने दिनों में वह वृद्ध मूर्तिकार अवश्य भूख-प्यास से मर गया होगा या 


मरणासन्न होगा| भवन का द्वार खोलकर उसकी अवस्था देख लेनी चाहिए |’महाराज ने द्वार खुलवाया| बड़ई तो अदृश्य हो चूका था; किन्तु वहा श्री जगन्नाथ,सुभद्रा तथा बलरामजी कि असम्पूर्ण प्रतिमाऐ मिली| राजा को बड़ा दुःख हुवा मुर्तियो के सम्पूर्ण न होने से!, किन्तु उसी समय आकाशवाणी हुई –‘चिंता मत करो !इसी रूप में रहने कि हमारी इच्छा है| मुर्तियो पर पवित्र द्रव्य (रंग आदि )चढाकर उन्हें प्रतिष्ठित कर दो ! इस आकाशवानी के अनुसार वे ही मुर्तिया प्रतिष्ठित हुई | गुंडीचा मंदिर के पास मूर्ति निर्माण हुवा था,अत गुंडीचा मंदिर को ब्रम्हालोक या जनक पुर कहते है|

द्वारिका में एक ब़ार श्री सुभद्रा जी ने नगर देखना चाहा| श्री कृष्ण तथा बलरामजी उन्हें पृथक रथ में बैठाकर ,अपने रथो के मध्य उनका रथ करके उन्हें नगर-दर्शन कराने ले गए|इसी घटना के स्मारक –रूप में यहाँ रथ यात्रा निकलती है|


उत्कल में ‘दुर्गा-माधव-पूजा’एक विशेष पद्धति ही है| अन्य किसी प्रान्त में ऐसी पद्धति नही है| इसी पद्धति के अनुसार श्री जगन्नाथ को भोग लगा नैवेध्य विमला-देवी को भोग लगता है और तब वह महाप्रसाद माना जाता है|

पूरीधाम के अन्य मंदिर :-
(1) गुंडीचा मंदिर
(2) कपालमोचन
(3) एमार मठ
(4) गंभीराम मठ(श्री राधाकान्त मठ)
(5) सिद्धबकुल
(6) गोवर्धन पीठ (शंकराचार्य मठ)
(7) कबीर मठ
(8) हरीदास जी कि समाधी
(9) तोटा गोपीनाथ
(10) लोकनाथ
(11) बेडी-हनुमान
(12) चक्रतीर्थ और चक्रनारायण
(13) सोनार गौराग्ड
(14) कानवत हनुमान

                                                             जारी है ……

Saturday, September 16, 2017

सम्पूर्ण दर्शन श्री जगन्नाथ जी -पुरी -ओडिशा..................

प्राम्भ से पढ़ें…
निज मंदिर :-
प्रायः मंदिर कि परिक्रमा करके (थोडा परिक्रमांश शेष रहता है ) यात्री निज मंदिर के जगमोहन में प्रवेश करता है | जगमोहन गरुड़स्तंभ(भोग मण्डप में) है| श्री चैतन्यमहाप्रभु यही से श्री जगन्नाथ जी के दर्शन करते थे| वहा एक छोटा गड्डा भूमि में है| कहा जाता है| कि वह गड्डा महाप्रभु के आसुओ से भर जाया करता था गरुड़ स्तंभ को दाहिने करके तथा जय-विजय (भोग मण्डप)कि मूर्तियों को प्रणाम करके तब आगे निज मंदिर में जाना चाहिए |


निज मंदिर 16 फुट उची 4 फुट उची वेदी है| इसे रत्न वेदी कहते है| वेदी के तीन ओर 3 फुट चौड़ी गली है,जिससे यात्री श्री जगन्नाथ कि परिक्रमा करते है| इस वेदी पर श्री जगन्नाथ,सुभद्रा तथा बलराम जी कि मुख्य मुर्तिया विराजमान है| श्री जगन्नाथ श्याम वर्ण है| वेदी पर एक ओर 6 फुट उचा सुदर्शन चक्र प्रतिष्ठित है| यही नीलमाधव,लक्ष्मी तथा सरस्वती कि छोटी मुर्तिया भी है|

श्री जगन्नाथ ,सुभद्रा तथा बलरामजी कि मुर्तिया अपूर्ण है| उनके हाथ पुरे नहीं बने है| मुखमंडल भी सम्पूर्ण निर्मित नहीं है| इसका कारन आगे कथा में सूचित किया गया है|

यात्री एक ब़ार श्री जगन्नाथ जी के मंदिर में भीतर तक जाकर चरण स्पर्स कर सकते है| जगमोहन में से दर्शन तो प्रायः रात्रि में पट बंद होने के अतिरिक्त सभी समय होता है; किन्तु यहाँ कि सेवा पद्धति कुछ ऐसी है कि यह निश्चित नहीं कि किस समय भोग लगेगा और कब सबके लिए भीतर तक जाने कि सुविधा प्राप्त होगी| प्रायः रात्रि में ही यह सुविधा होती है| दिन में भी एक समय यह सुविधा मिलती है, किन्तु प्रतिदिन उसके मिलने का निश्चित नहीं है|
लिंग राज मंदिर -भुवनेश्वर 

विशेषोत्सव :-
वैशाख शुक्ल तृतीय को ज्येष्ट कृष्णा 7 तक 21 दिन चन्दन यात्रा होती है| इस समय मदनमोहन,राम-कृष्ण,लक्ष्मी-सरस्वती,पञ्चमहादेव (नीलकंठेश्वर,मारकंडेश्वर,लोकनाथ,कपालमोचन,और जम्मेश्वर)के उत्सव-विग्रह चन्दनतालाब पर जाते है| यहाँ स्नान तथा नौका-विहार होता है|
जयेष्ट शुक्ल एकादशी को रुखमनी-हरण-लीला मंदिरों में होती है| जयेष्ट पूर्णिमा को श्री जगन्नाथ,सुभद्रा तथा बलराम जी कि स्नान यात्रा होती है| ये विग्रह स्नान –मण्डप में जाते है| वहा उन्हें 108 घड़ो के जल से स्नान कराया जाता है| स्नान के पश्चात् भगवान का गणेश – वेश में श्रृंगार होता है|कहा जाता है कि इस अवसर पर श्री जगन्नाथ जी ने एक गणेशजी के भक्त को गणेश रूप में दर्शन दिया था | इसके पश्चात 15 दिन मंदिर बंद रहता है|

आषाढ़शुक्ल द्वितीय को श्री जगन्नाथ जी कि रथ यात्रा होती है| यह पूरी का प्रधान महोत्सव है| तीन अत्यंत विशाल रथ होते है| पहले रथ पर श्री बलराम जी ,दुसरे पर सुभद्रा तथा सुदर्सन चक्र ,तीसरे पर श्री जगन्नाथ जी विराजमान होते है| संध्या तक ये रथ गुंडीचा मंदिर पहुच जाते है| दुसरे दिन भगवान रथ से उतर कर मंदिर में पधारते है और सात दिन वही विराजमान रहते है|दशमी को वहा से रथ पर लौटते है| इन नौ दिनों के श्री जगन्नाथ जी के दर्शन को ‘आड़पदर्शन’ कहते है| इसका बहुत अधिक महत्व माना जाता है|

श्रावण कि आमवस्या को जगन्नाथ जी के सेवको का उत्सव होता है| श्रावण में शुक्ल पक्ष कि दशमी से झूलन यात्रा होती है| जन्माष्टमी को जन्मोत्सव,भाद्रकृष्णा 11 को कालिया दमन,भाद्रशुक्ल 11 को पार्श्वपरिवर्त्नोत्सव,वामन द्वाद्शी अश्विनपूर्णिमा को सुदर्सन विजयोत्सव तथा नवरात्र में विमला-देवी के उत्सव – इस प्रकार मंदिर में प्राय: सभी पर्वो पर महोत्सव होते ही रहते है|
जारी है ……

Jagannath Temple, Puri - Odisha (श्री जगन्नाथ मंदिर,पुरी - ओड़िशा )

श्री जगन्नाथ चार परम पावन धामों मे एक है| ऐसी भी मान्यत है कि शेष तीन धामों में बद्रीनाथ सतयुग का, रामेश्वर त्रेता का तथा द्वारिका द्वापर का धाम है; किन्तु इस कलयुग का पावनकारी धाम तो पूरी ही है|
Jagannath Temple, Puri - Odisha

पहले यहाँ नीलाचल नामक पर्वत था और नीलमाधव- भगवान कि श्री मूर्ति थी उस पर्वत पर जिसकी देवता आराधना करते थे| वह पर्वत भूमि में चला गया और भगवान की वह मूर्ति देवता अपने लोक मे ले गए; किन्तु इस क्षेत्र को उन्ही कि स्मृति में अब भी नीलाचल कहते है| श्री जगन्नाथ जी के मंदिर के शिखर पर लगा चक्र ‘नीलछत्र’ कहा जाता है| उस नीलछत्र के दर्शन जहा तक होते है, वह पूरा क्षेत्र श्री जगन्नाथपूरी है|

इस क्षेत्र के अन्य अनेक नाम है| 
यह श्री क्षेत्र पुरुषोत्तम पूरी तथा शंखक्षेत्र भी कहा जाता है; क्युंकी इस पूरे पुण्यक्षेत्र कि आकृति शंख के सामान है| शाक्त इसे उद्द्यानपीठ कहते है 51 शक्ति पीठो में यह एक पीठ स्थल है|सती की नाभी यहाँ गिरी थी|

श्री जगन्नाथजी के महाप्रसाद कि महिमा तो भुवन विख्यात है| महाप्रसाद में छुवा छूत का दोष तो माना ही नहीं जाता, उित्छष्टीता दोष भी नहीं माना जाता और व्रत पर्वदिन के दिन भी उसे ग्रहण करना विहित है| 

सच तो यह है कि भगवतप्रसाद अन्न या पदार्थ नहीं हुवा करता| वह तो चिन्मय तत्व है| उसे पदार्थ मानकर विचार करना ही दोष है| श्री वल्लभाचार्य महाप्रभु पुरी पधारे तो एकादशी-व्रत के दिन उसकी निष्ठा कि परीक्षा के लिए उनको किसी ने मंदिर में ही महाप्रसाद दे दिया | आचार्य ने महाप्रसाद हाथ में लेकर उसका स्तवन प्रारंभ किया और एकादशी के पुरे दिन तथा रात्रि उसका स्तवन करते रहे| दुसरे दिन द्वादशी में स्तवन समाप्त करके उन्होंने प्रसाद ग्रहण किया इस| प्रकार उन्होंने महाप्रसाद एवम एकादशी दोनों को समुचित आदर दिया|

श्री जगन्नाथ मंदिर :-
श्री जगन्नाथ जी का मंदिर बहुत विशाल है | मंदिर दो परकोटो के भीतर है| इनमे चारो ओर चार महाद्वार है| मुख्य मंदिर के तीन भाग है-विमान या श्री मंदिर जो सबसे उचा है; इसीमें श्री जगन्नाथ जी विराजमान है| उसके सामने जगमोहन है और जगमोहन के पश्चात मुखशाला नामक मंदिर है| मुखशाला के आगे भोगमण्डप है|
श्री जगन्नाथ मंदिर के पूर्व में सिंह द्वार,दक्षिण में अश्व द्वार ,पश्चिम में व्याघ्रद्वार और उत्तर में हस्ती द्वार है|

निज मंदिर के घेरे के मंदिर :-
सिंह द्वार के सम्मुख कोणार्क से लाकर स्थापित किया उच्च अरुण स्तम्भ है| इसकी परिक्रमा करके सिंह द्वार को प्रणाम करके द्वार में प्रवेश करने पर दाहिनी ओर पतित पावन जगन्नाथ जी के विग्रह(द्वार में ही ) दृष्टीगोचर होते है| इनके दर्शन सभी के लिए सुलभ है| विधर्मी भी इनका दर्शन कर सकते है|

आगे एक छोटी मंदिर में विश्वनाथ लिंग है| कोई ब्राम्हण काशी जाना चाहते थे| श्री जगन्नाथ जी ने उन्हें स्वप्न में आदेश दिया कि उक्त लिंगमूर्ति के अर्चन से ही उन्हें विश्वनाथ जी के पूजन का फल प्राप्त हो जायेगा|

श्री जगन्नाथ जी के मंदिर के दुसरे प्राकार के भीतर जाने से पूर्व २५ सीढी चड़ना पड़ता है| इन सीढियों को प्राकृति के २५ विभागो का प्रतिक माना गया है| द्वीतीय प्रकार के द्वार में प्रवेश करने के पूर्व दोनों ओर भगवत प्रसाद का बाज़ार दिखायी देता है|

आगे अजाननाथ गणेश ,बटेरा महादेव एवम पटमंगला देवी के स्थान है| सत्यनारायण – भगवान है| इसकी सेवा अन्यधर्मी भी करते है| आगे वट वृक्ष है ,जिसे कल्प वृक्ष कहते है| उसके नीचे बालमुकुन्द (वटपत्रशायी) के दर्शन है| वट वृक्ष कि परिक्रमा कि जाती है| वहा से आगे गणेश जी का मंदिर है| इन्हें सिद्ध गणेश कहते है | पास सर्वमंगला देवी तथा अन्य देवी मंदिर है|
Jagannath Mandir, Puri

श्री जगन्नाथजी के निज मंदिर के द्वार के सामने मुक्ती मण्डप है| इसे ब्रम्हासन कहते है| ब्रम्हाजी पूर्व काल में यज्ञ के प्रधानाचार्य होकर यही विराजमान होते थे| इस मुक्तीमण्डप में स्थानीय विद्वान ब्राम्हण के बैठने कि परिपाटी है|

मुक्तीमण्डप के पीछे कि ओर मुक्तनृसिंह का मंदिर है| ये यहाँ के क्षेत्रपाल है| इस मंदिर के पास ही रोहानी कुण्ड है| उसके समीप ही विमलादेवी का मंदिर है| यह यहाँ का शक्ति पीठ है| जैन लोग इस विग्रह का सरस्वती नाम से पूजन करते है|
रात में मुख्य द्वार -पुरी 

यहाँ से आगे सरस्वती जी का मंदिर है| सरस्वती तथा लक्ष्मी जी के मंदिर के बीच में नीलमाधव जी का मंदिर है| यही कुर्मबेढा में श्री जगन्नाथ जी का अन्य छोटा मंदिर है| समीप ही काक्षीगणेश कि मूर्ति है| आगे भुनेश्वरी देवी का मंदिर है| उत्कल के शाक्त आराधकोकी ये आराध्या है|

वहा से आगे श्री लक्ष्मी जी का मंदिर है| इन मंदिरों में श्री लक्ष्मीजी कि मुख्यमूर्ति है| समीप ही श्री शंकराचार्य जी तथा लक्ष्मीनारायण मुर्तिया है| इसी मंदिर के जगमोहन में कथा तथा अन्य शास्त्र चर्चा होती है|


श्री लक्ष्मी जी के मंदिर के समीप सूर्य मंदिर है| मंदिर में सूर्य,चन्द्र तथा इंद्र कि छोटी-छोटी मुर्तिया है| कोणार्क- मंदिर से लायी हुई सूर्य भगवान कि प्रतिमा इसी मंदिर में गुप्त स्थान में रखी गयी है|

पास में पातालेश्वर महादेव का सुन्दर मंदिर है| इनका महात्म बहुत माना जाता है| यही उत्तरमणि देवी कि मूर्ति है| यहाँ से पास ही ईशानेश्वर मंदिर है| इनको श्री जगन्नाथ जी का मामा कहते है| इस लिंग विग्रह के सम्मुख जो नंदी कि मूर्ति है, उससे गुप्तगंगा का प्रवाह निकला है| वहा नख से आघात करने से जल निकल आता है|

यहाँ से आगे निज मंदिर से एक द्वार बहार जाता है| इस द्वार को बैकुण्ठ द्वार कहते है| वैकुण्ठ द्वार के समीप वैकुंठेश्वर महादेव का मंदिर है| यहाँ बगीचा-सा है|बारह वर्ष पर जब श्री जगन्नाथजी का कलेवर-परिवर्तन होता है,तब पुराने विग्रह को यही समाधी दी जाती है|

जय विजय द्वार में जय विजय कि मुर्तिया है| इसका दर्शन करके,इनसे अनुमति लेकर तब निज मंदिर में जाना उचित है| इसी द्वार के समीप श्री जगन्नाथ जी का भंडार घर है|    जारी है … आगे पढें

इन्हे भी देखे :- 

Konark Sun Temple , Odisha (कोर्णाक सूर्य मंदिर-ओडिशा-भारत)

ओडिशा के पावन धरा पर पुरी क्षेत्र के समुद्र किनारे विशाल व विश्व विख्यात सुर्य मंदिर स्थीत है। ईस मंदिर मे सूर्य कि पहली किरण मंदिर के गर्भ गृह मे स्थीत सूर्य कि प्रतिमा पर पडती थी 
Odisha,Konark Sun Temple

konark Mandir

Konark Sun Temple

Konark Sun Temple,india

ईस मंदिर के अंदर चुम्बक लगी थी जिसकी मदद से यहा कभी सैकडो टन प्रतिमा हवा मे तैरा करती थी मंदिर के शिखर पर लगे चुम्बक पत्थर कि वजय से मंदिर के समिप समुद्र के किनारे जाने वाले जहाजो का कम्पास फेल हो जाता था और गलत दिशा बताता था जिसकी वजय से जहाज दूर्घटना का शिकार हो जाते


Konark odisha

जिस कारण पुर्तगालियो को भारी नुकसान उठाना पडता था पुर्तगालियो ने ईसका राज का पता लगा लिया और मंदिर के शिखर पर लगे चुम्बक को चोरी कर ले गये और बंगाल के सुल्तान सुलेमान खान कर्रानी जिसे काला पहाड भी कहा जाता है जिसने ईस मंदिर को बार बार लूटा भारी नुकसान पहुचाया गया मंदिर की मुर्तिया खजाने को चोरि कर ले गये शिखर को बारूद से उडा दिया जैसे हि शिखर गिरा मुख्य मंदिर टूट गया क्योकि मंदिर का प्राण उसके शिखर पर था (पुरी के पंडितो ने यहा कि मुख्य प्रतिमा को पवित्र बनाये रखने के लिये बालू मे दबा दिया )आज यह प्रतिमा पुरी के जगन्नाथ मंदिर मे है।

कोर्णाक का सूर्य मंदिर जिसे अग्रेजी मे ब्लैग पगोडा भी गया है।

ईसे लाल बलुवा पत्थर और काले ग्रेनाई पत्थर से 1236 - 1234 ई पू मे गंग वंश के राजा नृसिहदेव बनाया गया था।

यह मंदिर भारत के सबसे प्रसिध्द स्थलो मे से एक है।
ईसे सन 1974 मे युनेस्को द्वारा विश्व धरोहर घोषित किया गया है।

कलिग शैलि मे निर्मत यह मंदिर सूर्य देव (अर्क) के रथ के रूप मे निर्मित है।

इस स्थान पर श्री कृष्ण भगवान के पुत्र साम्भ ने सुर्य की कडी तपस्या कर कोड रोग से मुक्ती प्राप्त किया था।
सूर्य के काल्पनिक रथ के समान इस मंदिर कि आकृती है।

Konark Sun Temple

konark


12 एकड मे फैला यह मंदिर जिसको बनाने मे 1200 सौ मजदूर व 12वर्ष मे यह मंदिर का निर्माण किया था।

ईस मंदिर का मुख्य वास्तु कार विशु मोहराना था। उसके 12 वर्ष के पुत्र धर्मपथ मोहराना ने ईस मंदिर के शिखर पर 250 टन का चुम्बक लगाया था। और वहा से कुदकर अपनि जान दि थी।
ईस मंदिर के पिछे सुर्य की पत्नी संध्या और छाया की मंदिर बनि हूई है।
संपूर्ण मंदिर स्थल को एक बारह जोडि चक्रो वाले सात घोडो से खीचे जाते सूर्य देव के रथ के रूप मे बनाया गया है मंदिर की संरचना जो सूर्य के सात घोडो द्वारा दिव्य रथ को खिचने पर आधारित है।
Konark Sun odisha

 अब ईनमे से एक हि घोडा बचा है। इस रथ की पहिये जो कोर्णाक कि पहचान बन गये है। बारह चक्र साल के बारह महिने को प्रतिबिंबित करते है जबकि प्रत्येेक चक्र आठ अरो से मिल कर बना है जो दिन के आठ पहरो को दर्शाते है। जिसमे सटिक समय का पता लगाया जाता है।ईस
मंदिर मे विषाल से विषाल ढाचा और महिन से महिन नक्कासी मंदिर के ईन्च ईन्च मे देखने को मिलति है।

ईस मंदिर मे सूर्य देव कि तीन प्रतिमा है।
(1) बाल्यकाल -उदित सूर्य
(2) युवावस्था- मघ्यान सूर्य
(3) प्रौढपस्था- अस्त सूर्य

ईसके प्रवेष द्वार पर दो सिह हाथियो पर आक्रमन होते हूवे रक्षा मे तत्पर दिखाई देते है।

singh in konark

यह कोर्णाक मंदिर वास्तु दोष के कारण मात्र 700 वर्षो मे हि ध्वस्त हो गया इसके अवषेष को एक संग्रालय मे सजो के रखा गया है।

Tuesday, September 5, 2017

Kachna Dhurwa Temple,Gariaband (कचना धुरवा मंदिर जिला - गरियाबंद - छत्तीसगढ)

पराक्रमी वीर कचना धुरवा मन्दिर ग्राम-बारूका जिला गरियाबंद (छत्तीसगढ) मे स्थीत है
यहा पर महान प्रतापि राजा कि यादे छुपि हूई है उसके साहस विरता और पराक्रम कि गाथा उस क्षेत्र  के कन कन पर बसी हुई है|
Kachna Dhurwa Gariaband

शत्रु उसका नाम सुनकर थर-थर कापने लगते थे छत्तीसगढ के वीरो का वह आर्दश था
कचना धुरूवा ने अपने राज्य मे न्यायपूर्ण शासन स्थापित किया ईस क्षेत्र मे उन्हे युग नायक के रूप मे प्रतिष्ठा प्राप्त हुई
Temple Of Kachan Dhurwa

Kachna Dhurwa Chhattisgarh

ईस क्षेत्र मे लोग उन्हे देवता के रूप मे मानते और उसकी पूजा करते है
गोंड जाति के लोगो के लिये तो भगवान स्वरूप ही है|

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Monday, September 4, 2017

Baba Kuti Ashram ,Fingeshwar - Chhattisgarh (बाबा कुटी आश्रम फिंगेश्वर ,गरियाबंद- छत्तीसगढ़ )

बाबा कुटी आश्रम जिसे माण्डव्य ऋषि आश्रम भी कहा जाता है यह आश्रम  गरियाबंद जिले के फिगेश्वर ब्लाक मे आता है जो फिगेश्वर  से काफि नजदीक लगभग 1  कि. मी. की दूरी पर राजिम र्माग मे सगन वनो के बीच मे है यह माण्डव ऋषि और बाबा श्री श्री 108 श्री सीया भुनेश्वरी शरण ब्याश कि तपस्या स्थिली है| 
ashram baba kuti fingeshwar

यहा बाबा कि कुटिया  मन्दिर  और उसकी यज्ञ शाला स्थित है यहा का वातावरन काफि रमनीय चारो तरफ घने वनो  से आश्रम घिरा हुवा है| यहा पर आके भक्तो को परम शांति का अनूभव होता है|

इस स्थान की मान्यता :-  कहा जाता है की भगवान  राम अपने वनवास के समय फिंगेश्वर के फनिकेश्वर नाथ महादेव की पूजा अर्चना किया था उसके बाद वहा  से  राजिम  गए थे यही बाबा कुटी जो रामायण कालीन माण्डव्य  ऋषि  का आश्रम था तब भगवान राम यहाँ पर रुके थे उनसे आगे का रास्ता पूछा था तथा गुरु का वंदन किया था तब से यह स्थान पावन तीर्थ के रूप में पूजा जाता है | 

यहाँ पर समय - समय धार्मिक अनुष्ठान होते रहते है | साथ ही यहाँ पर प्रति वर्ष कार्तिक पूर्णिमा को स्नान ध्यान करके भोले बाबा की पूजा किया जाता है फिर आवला वृक्ष के निचे भोजन बनाया जाता है  जिसमे  आस पास के ग्राम के महिलाओं द्वारा  समूह में आवला भात खाया जाता है जिसमे भारी  संख्या में भीड़  देखने को मिलती  है|   

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Sunday, September 3, 2017

Ghatarani Temple And Waterfall ,Gariaband ( माँ घटारानी मंदिर )

छत्तीसगढ राज्य के गरियाबंद जिले के कोपरा नवापारा पाण्डुका क्षेत्र मे मां घटारानी का पवित्र धाम स्थीत है यहा माता को आदि शक्ति के रूप मे पूजा जाता है माता के दरबार मे भक्तो का ताता लगा रहता है
ghatarani waterfall

 माॅ विशाल चट्टानो के गुफा के अन्दर निवास करती है माता स्यमभू है स्थानिय लोग माता को वनदेवी के नाम से पुकारते है 
Ghatarani MATA mANDIR


GHATARANI CHHATTISGARH

TEMPLE OF GARIABAND


यहा पर माॅ के दरबार मे घने जंगल विशाल पर्वत पर पवित्र झरने कि कलकल ध्वनी सभी माता के भक्तो तथा पर्यटको को अपनी ओर आकर्षित करती रहती है यहा दूर दूर से शैलानीयो का आना जाना लगा रहता है यहा पर आके प्रकृति वातावरन से रूब रू होने का मौका मिलता है यह छत्तीसगढ के उत्तम पर्यटन स्थलो मे इसकी गणना किया जाता है यहा साल के बाकि दिनो कि अपेक्षा बरसात तथा नवरात्रि मे भारी भीड देखने को मिलती है
Maa Ghatarani

यहा माता के दरबार से 14  कि. मी. की दूरि पर आगे से बगल मे जतमई माता का मन्दिर स्थीत है यहि से आगे 35   कि मी कि दूरी पर कचना धुरवा के दर्शन करते हूवे भुतेश्वर महादेव विश्व का सबसे बडा प्राकृतिक शिवलिंग के दर्शन कर सकते है

कैसे पहुचे  - रायपुर से इसकी दूरी 91  कि. मी. है|  राजिम मार्ग से होते हुवे यहा पहुचा जा सकता है रास्ते उत्तम है साथ मे यहा के आस पास के स्थान पिकनिक के लिये उत्तम है|
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