Monday, July 31, 2017

Nathal Dai Temple Chandarpur - Chandrahasini नाथल दाई मन्दिर चन्द्रपुर

नाथल  दाई मन्दिर  टिमरलगा -चन्द्रपुर ,चंद्रहासिनी  मंदिर के समीप में ही  है  यह मंदिर महानदी के तट  पर  दो नदियों के संगम पर स्थित है |  कहते है की यदि कोई भक्त नाथल  दाई  के दर्सन  करने मात्र से ही उसके सभी पाप नष्ट  हो जाते है | इसलिए इसे  इसे सिद्ध शक्ति पीठ भी कहा जाता है यहाँ पर बाकि दिनों की अपेक्षा नवरात्रि में भारी  भीड़ देखि जाती है यहाँ पर माता के दर्शन के लिए दूर - दूर से भक्त जण  भारी मात्रा में आते है | 
Nathal Dai Mandir
नाथल दाई 

मुख्य द्वार 

Nathal Dai Mandir
नाथल दाई  मन्दिर

महानदी : नौका  विहार 

यही मंदिर के समीप प्रथम दर्शन भोले बाबा के होती है उसके बाद माता के दरबार  में भक्त जाते है  , यहा  शिव मंदिर पर श्रावण सोमवारी व महाशिवरात्रि पर भारी  मात्रा में भोले बाबा को जल अभिषेक करने के लिए भक्त जन  आते  है |   
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Sunday, July 30, 2017

Raigarh Ka Baba Satyanarayan - Kosamnara (सत्यनारायण बाबा रायगढ़ छत्तीसगढ़)


अवतारी पुरूष महान तपस्वी श्री श्री बाबा सत्यनारायण जी ने (देवरी) डूमरपाली ग्राम के मध्यवर्गीय कृषक परिवार में 12 जुलाई सन् 1984 को पिता श्री दयानिधि, माता श्रीमती हसंमती साहू के घर पुत्र रूप में जन्म लिया। 
satyanarayan baba kosamnara raigarh
Satyanarayan Baba  Raigarh Chhattisgarh

बाबा का नाम हलधर रखा गया। परंतु बाबा के पिता इन्हे सत्यम कहकर पुकारते थे। बाबा जी को बाल्यकाल से ही शिव स्वप्न में दर्शन देने लगे। जिसके बारे में बाबा अक्सर अपनी माँ एवं दादी को बताते थे। एक बार हलधर गाँव के ही शिव मंदिर में 7 दिन और 7 रात तक ध्यान लगाकर शिव उपासना में बैठ गए। उसके बाद बाबा निरंतर अपने ईष्ट देव में ही खोये रहे। शिव के प्रति उनकी आस्था देकखर गांव के बड़े बुढ़े एवं घर परिवार के लोगों ने उन्हे सत्यनारायण नाम दिया।
बताया जाता है कि सत्यनारायण 16 फरवरी 1998 को आम दिनों की भांति घर से स्कूल जाने के लिए निकले थे पर स्कूल ना जाकर अपने ईष्ट देव का नाम जाप करने के लिए पूर्व में ईश्वर द्वारा निर्धारित उचित स्थान की तलाश में चल पड़े। पैतृक ग्राम (देवरी) डुमरपाली से 18 कि.मी. दूर कोसमनारा ग्राम के उजाड़ बयावान जगह पर तलाश पूरी हुई और सत्यनारायण ने यही पर अपनी तपस्थली बना डाली। उसी दिन एक पत्थर को शिवलिंग मानकर अपनी जिव्हा अर्पण कर तपस्या में लीन हो गए। लगभग एक सप्ताह बाद एक सेवक ने शिवलिंग के बगल में बाबा जी से आज्ञा लेकर अग्नि (धुनी) प्रज्जवलित कर दिया जो आज अखण्ड धुनि के रूप में निरंतर प्रज्जवलित है। आरंभ में बाबा जी की तपस्या को आम लोगों के द्वारा स्वीकार नहीं किया जा रहा था। कुछ लोगोंं द्वारा परेशान करने एवं बाबा जी को अपने स्थान से उठाने का प्रयास प्रशासन एवं कई लोगों द्वारा किया गया। बाबा जी की तपस्या को देखकर जहां परेशान करने वाले बढ़ रहे थे वहीं श्रद्धालु भक्तों की भी संख्या लगातार बढ़ रही थी। इसी को देखते हुए बाबा जी की 24 घंटा चौकसी होने लगी। बाबा जी के तपस्या की ख्याति धीरे-धीरे चारों ओर फैलने लगी। इसे देख सुनकर आसाम कामाख्या से श्री श्री 108 श्री मौनी कलाहारी बाबा (उम्र 108 वर्ष) भी कोसमनारा, रायगढ़ सत्यनारायण बाबा की तपस्या देखने आये। बाबा की तपस्या से प्रभावित होकर दिनांक 02.04.2003 से 08.04.2003 तक श्री श्री 108 श्री सत्य चण्डी महायज्ञ किया गया एवं बाबा सत्यनारायण जी को श्री श्री 108 की उपाधि देकर अपने स्व धाम को वापस हो गए। तब से आज तक प्रतिवर्ष उनके अनुयायी यहां कोसमनारा आते है।

भारी मात्रा में भक्त जन दर्शन करने आने लगे और मनवांछित फल पाने लगे। निर्माण शरू हुआ, प्रथम कुटिया बनी, फिर पानी की व्यवस्था हुई। धीरे-धीरे बाबा जी का धाम अपना स्वरूप लेने लगा। पत्थरों की जगह शिवलिंग की स्थापना हो गई। धुनि की जगह हवन कुण्ड बना दिया गया। बाबा जी खेत की जमीन पर बैठे थे। भक्तों के अनुरोध पर चबूतरा पर बैठने को राजी हुए। जगत जननी अष्टभूजी दुर्गा माता मंदिर का निर्माण 2009 में पूर्ण हुआ।

खुले आसमान के नीचे साधना करते हैं बाबा जी
बाबा जी 16 फरवरी 1998 से अब तक तीनों मौसम ग्रीष्म, वर्षा एवं ठंड ऋतु में खुले आसमान के नीचे निरंतर सुबह 7.00 से रात्रि 12.00 बजे तक अपने ईश्वर की साधना में तपस्यारत रहते है। बाबा जी किसी भी भक्तजन से वार्तालाप नहीं करते। बाबा जी प्रतिदिन सुबह 6 से 7 बजे एवं रात्रि 12:30 बजे 2 बजे तक आने वाले सभी भक्तों से मुलाकात करते है और बाबा जी अपनी बातों को भक्तों से ईशारे से कहते है। शनिवार को बाबा जी अपने भक्तों से रात्रि 12:30 से सुबह 5 बजे तक मिलते है।


कैसे पहुंचे :- यह  बाबा का धाम चंद्रहासिनि मंदिर से लगभग ३० कि.मी  की दुरी पर  रायगढ़ के कोसमनारा ग्राम पर स्थित है|


Friday, July 28, 2017

Maa Chandrahasini Temple Chandrapur ,Janjgir - Champa -Chhattisghar (चन्द्रहासिनी मन्दिर चन्द्रपुर)

माँ चन्द्रहासिनी मंदिर चंद्रपुर  जांजगीर -चांपा  ( छत्तीसग़ढ़ )

माँ चन्द्रहसिनी का प्रसिद्ध  मंदिर छत्तीसग़ढ़ के जांजगीर - चांपा  जिले में स्थित है|  यह विशाल महानदी के तट पर चंद्रपुर  नामक  नगर पर स्थित है  इसे माँ दुर्गा का रूप भी माना  जाता है| माता रानी का मंदिर काफी विशाल है जिसे देखते ही लोगो की  आखे चकाचौंद  हो जाती है   माता का भव्य स्वरुप सभी भक्तो को अपनी ओर  आकर्षित  करती है | यहाँ मंदिर परिसर पर नाना प्रकार की भव्य प्रतिमा  का निर्माण किया गया है
Maa Chandrahasini mandir

जिसमे विशाल हनुमान जी ,अर्ध नारिश्वर  महादेव की प्रतिमा भक्तो को दूर से ही नजर आती है  ,यहाँ पर द्रोपती चिर हरण ,कृष्णा की बाल लीला ,गजराज को भगवान  विष्णु के द्वारा उसकी रक्षा  करने की प्रतिमा  माँ दुर्गा के नव रूप  अनेक ऋषि मुनि की प्रतिमा बनी  हुई है | यहाँ पर एक सर्व धर्म की मंदिर बनी  हुई है | जिसमे सभी धर्मो में आराध्य देवी  देवतावो की प्रतिमा स्थापित किया गया है |  यह मंदिर सभी धर्मो को एकता के सूत्र में बांधने  का कार्य कर रही है |
चन्द्रपुर,chhattisghar

यहाँ पर हर समय माता के दरबार में हजारो - लाखो भक्तो का ताता  लगा रहता है उन सभी भक्तो को माता के दर्शन में किसी प्रकार की कोई  कस्ट  ना हो उसका उचित  व्यवस्था मंदिर समिति के द्वारा किया गया है 
चन्द्रपुर mandir,temple in cg

यहाँ पर प्रति वर्ष शारदीय  और चैत्र  नवरात्र  में यहाँ विशाल मेले का आयोजन किया जाता है |   जिसमे विशाल जन  समुदाय उमड़ता है | जो देखने लायक होता है इस नगर में दशहरा को काफी धूमधाम और हर्ष उल्लास के साथ मनाया जाता है |
Maa Chandrahasini Temple

temple in Maa Chandrahasini


यहाँ पर मंदिर से थोड़ी दूर माँ  नाथल  दाई   का मंदिर स्थित है  जो महानदी के संगम के भीच  टापू पर स्थित  है |


 कैसे पहुंचे -  यह मंदिर जिला मुख्यालय  जांजगीर  से लगभग  120  कि. मी  तथा रायगढ़ से 32  कि. मी  की दुरी पर स्थित है | राजधानी रायपुर से यहाँ  सरायपाली  सारंगढ़  होते हुवे लगभग 200  कि. मी  दुरी तय कर यहाँ पंहुचा  जा सकता है यहाँ नियमित बसे  चलती रहती है | यही रास्ते  से परम तेजस्वी कलयुग के भगवान बाबा सत्यनारायण के दर्शन किया जा सकता है |   जो लगभग १२  वर्षो से तपस्या में बैठे है | 

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Saturday, July 1, 2017

History of Singhora Temple-Saraipali ( सिंघोड़ा मंदिर का ईतिहास )

सिंघोड़ा मंदिर से जुडी कुछ रोचक जानकारी 

अगर आप सरायपाली से सम्बलपुर राजमार्ग क्रमांक 53 में सफर कर रहे है तो सिंघोडा के पहाडों और चट्टानो के बिच मां रुद्रेश्वरी का दर्शन कर सकते है|
Singhoda Temple Saraipali
सिंघोड़ा  मन्दिर 
सरायपाली से सम्बलपुर जाने वाले रसिया राजमार्ग क्रमांक 53 में सरायपाली से 20 किलोमीटर दूर ओडिसा सीमा से लगे ग्राम सिंघोडा में स्थित है| .......  माता रुद्रेश्वरी का मंदिर पहाडों और चट्टानो को काटकर बनाया गया है| माता रुद्रेश्वरी देवी का भव्य मंदिर स्वर्गीय स्वामी शिवानंद जी महाराज के द्वारा....... तीन दशक पहले, सन 1977 में आसाम से द्वारीकापुर की तीर्थ यात्रा पैदल जा रहे थे और यात्रा के दौरान इसी पहाडी और यहां के शांत वातावरण ने उन्हे कुछ देर रूकने पर विवश  कर दिया, उन्हे विश्राम के दौरान माता की भव्य मंदिर बनाने की आत्म प्रेरणा मिली।
सिंघोड़ा मंदिर

Some interesting information related to Singhoda temple


उस समय यहां मा भगवती घंटेष्वरी देवी का एक छोटा सा जीर्ण-शीर्ण स्थान था। राष्ट्रिय राजमार्ग पर चलने वाले अधिकांश ट्रक और कई वाहन मंदिर के सामने रूकते और मां के दर्शन कर कुछ देर विश्राम करते और फिर अपनी मंजिल की ओर निकल पड़ते। मानो लंबी यात्रा के लिए यह कोई पडाव हो। यहां की प्राक्रितिक सौंदर्य और चारो ओर घनी पहाडियां लोगों को अपनी ओर आकर्शिक करते हैं, सड़क के दूसरे किनारे सरकार द्वारा बनाया गया बांध और एक छोटा नाला जिसके निकट वन विभाग की नर्सरी स्थित है, मंदिर के समीप एक खतरनाक मोड भी है। स्वामी शिवानंद जी महाराज कुछ वर्षो बाद द्वारिका धाम से वापस आकर यहीं रूक गए और भव्य मंदिर निर्माण का विचार देखते ही देखते माता की कृपा और आशिर्वाद से बिना किसी से चंदा लिए धर्मप्रेमी जन स्वतः ही मंदिर निर्माण में अपना सहयोग देने आगे आते गए और मंदिर बनना सुरु हो गया। जानकार बताते है कि मंदिर को पूरा बनने में लगभग 18 वर्ष लग गए, 

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राष्ट्रीय राजमार्ग से लगकर पहाडी पर 81 फुट उंचे भव्य मंदिर का निर्माण सम्पन्न हुआ। राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक 53 से इसकी उंचाई 131 फुट है, सवा 5 फुट उंची संगमरमर से बनी मां रुद्रेश्वरी देवी की प्रतिमा स्थापित की गई, मंदिर दक्षिणमुखी है और सड़क से करीब 65 सीढीयां जो 60 फुट चैंडी है, को चढ़कर माता के दर्शन को जाया जाता है, विशाल 20 खंभों पर बना माता के इस मंदिर के चारो ओर मां दुर्गा के 9 अवतारों के भित्ती चित्र बने हुए है। मंदिर के मुख्य द्वारा चौकट दरवाजे व अन्य दरवाजों पर काष्ट शिल्प का बेहतरीन उपयोग किया गया है, मांरुद्रेश्वरी की स्थिापित प्रतिमा पर 10 फुट गोलाई का ऐक गुंबद है, मंदिर के उपरी हिस्से में भी एक 

singoda Mandir

गुंबद बना है जिसका व्यास 140 फुट तथा उंचाई करीब 65 फुट के भीतरी भाग में चारों ओर संगमरमर लगा हुआ है। मंदिर के कुछ ही दूरी पर दोनो तरफ ज्योति प्रज्जवलित कक्ष, हवनकुंड आकर्शक बनाया गया है। मां रूद्रेष्वरी देवी मंदिर में 12 माह 24 घंटे श्रधालुओं की चहल-पहल रहती है, दोनो नवरात्र पर्व में अन्य तीज त्यौहारों की अपेक्षा ज्यादा रहती है। मां रूदे्रष्वरी देवी ट्रस्ट के द्वारा प्रतिवर्ष नेत्र शिविर व अन्य सामाजिक धार्मिक जनहित के कार्य लगातार किए जाते है, 12 बजे अन्न प्रसाद लगता है, मां घंटेष्वरी देवी की प्राचिन प्रतिमा वर्तमान मंदिर के सामने बने बांध के पास कुंभी वृक्ष के नीचे स्थापित है

rudreswari mandir Singhora Saraipali
माता रुद्रेश्वरी मंदिर 
उस स्थान पर अनेकों मंदिर बनाने एवं माता जी की प्रतिमा को कहीं और स्थापित करने की अनेको बार कोशिस की गई परन्तु माता ने स्वप्न में आकर मना कर दिया कि मुझे कहीं और नही जाना और इसी स्थान पर मंदिर बनाना है। बाबा स्वर्गीय शिवानंद जी महाराज को माता का आर्षिवाद प्राप्त था और उन्ही के अथक परिश्रम से माता का मंदिर बनकर तैयार हुआ जहां दूर दराज से भक्त अपनी मन्नतों को लेकर यहां पहुंच रहे है।

संकलन 
वृन्दावन पटेल ग्राम - दर्रीपाली(सराईपाली)