Saturday, March 21, 2020

Shivrinarayan Mandir Chhattisgarh ( शिवरीनारायण मंदिर ,जांजगीर चांपा -छत्तीसगढ़ )

Shivrinarayan Temple history in Hindi
छत्तीसगढ़ में एक ऐसा प्राचीन तीर्थ स्थल है|जिसका संबंध रामायण काल से जुड़ी हुई है।रामायण काल के कई रहस्य इस क्षेत्र में छुपी हुई है।जिसे आदिकाल से ही पुरषोत्तम तीर्थ , एवम् छत्तीसगढ़ का जगन्नाथ पूरी भी कहा जाता है।
Shivrinarayan Mandir shivrinarayan
शिवरीनारायण मंदिर
इस तीर्थ की पूजा गुप्त प्रयाग के रूप में कि जाती आ रही है| जिसकी ख्यति दूर-दूर तक फैली हुई है| जिसे शबरीनारायण धाम के रूप में पूजा जाता है|त्रिवेणी संगम पर स्थित होने के कारण इसका महत्व और अधिक बढ़ जाता है| संत मेले के दौरान इसमें शाही स्नान करते है।प्रतिदिन इस त्रीवेनी संगम पर 101बत्ती से सजी दीप से गंगा आरती कि जाती है|तथा भक्त जन त्रिवेणी संगम होने के कारण श्राद्ध तर्पण का कार्य करते है। 
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Sheorinarayan Temple
Sheorinarayan Temple Janjgir-Champa - Chhattisgarh
ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार भगवान राम का वनवास काल के दौरान, इस दण्डकारक क्षेत्र में ,माता शबरी से मुलाकात हुई , जहा पर भगवान राम ने शबरी के जूठे बेर ,प्रेम सहित ग्रहण किये।जिस कारण इस क्षेत्र का नाम शबरी – नारायण पड़ा जिसे कालांतर में शिवरीनारायण के नाम से जाना जाता है| 
Narayan Mandir Shivrinarayan
शिवरीनारायण मंदिर ,जांजगीर चांपा -छत्तीसगढ़
ऐतिहासिकता (Historicity)
भक्त माता शबरी के पिता का नाम ,राजा शबर था| वह इस क्षेत्र के प्रभावी राजा थे| माता शबरी जन्म से ही परम विष्णु भक्त थी| राजा शबर ,शबरी का विवाह करवाना चाहते थे| परन्तु शबरी को विवाह करना पसंद नहीं था| जिस कारण वह एक दिन अपने घर का परित्याग करके, भगवान कि खोज में वन कि ओर निकल पड़ती है| उन्ही दिनों वह पम्पा नामक एक सरोवर के पास पहुचती है| जहा पर उसे एक आश्रम दिखाई पड़ता है|वह आश्रम मतंग मुनि का आश्रम था।माता शबरी उस आश्रम में जाकर | मतंग ऋषि से शरण मागती है | ऋषि ने अपने दिव्य दृष्टी से सबरी को विष्णु भक्त जानकर उसे अपने आश्रम से शरण देती है| ऋषि ने शबरी को अपनी शिष्या बनाया ,और शिक्षा दीक्षा देना प्रारंभ किया| और भक्ति मार्ग का रास्ता प्रसस्त किया | मतंग ऋषि कि गुरुकुल कि ख्यति दूर दूर तक फैली हई थी| 
Shabri Mata Temple
शबरी माता मंदिर खरौद
भगवान श्री राम वनवास काल के दौरान जब चित्रकूट में निवास कर रहे थे| उसी दौरान मतंग ऋषि ने अपना देह का त्याग किया, मरनोउपरान्त आश्रम कि सारी जिम्मेदारी शबरी को सौपी ,क्युकी शबरी परम तेजस्वी, विदुषी,और वैष्णव भक्ति मार्ग पर चलने वाली आचार्य थी| 
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ऋषि ने मृत्यु उपरांत गूढ़ रहस्य शबरी को बताते हुवे कहते है कि भगवान विष्णु का अवतार, मानव रूप में अयोध्या में दशरथ के पुत्र, श्री राम के रूप में हुवे है| उनके वनवास काल के दौरान इस आश्रम में आएगे ,तुम उनकी बड़ी श्रधा भाव से सेवा सत्कार करना जिससे तुम्हारा कल्याण होगा और मोक्ष कि प्राप्ति होगी एवं इस आश्रम का नाम लोग युगों युगों तक याद रखेंगे| ऐसा कहकर वह अपना प्राण त्याग देती है| 
शिवरीनारायण मंदिर

गुरु के आज्ञा अनुसार शबरी इस आश्रम का संचालन करती है|तथा प्रत्येक दिन भगवान के आने कि बाठ देखते रहती, आश्रम से रास्ते तक चुन -चुन के फूल सजाया करती थी| व भोग लगाने के लिए मीठे -मीठे फल कि व्यवस्था करती थी| ऐशा करते कई वर्ष बित चुके थे| माता नित- नित बूढी होती जा रही थी, मगर उसको विश्वास था कि,गुरु ने कहा है। तो, एकदिन भगवान इस आश्रम में जरुर आयेंगे ,आश्रम के कुछ शिष्य शबरी का उपहास किया करती थे| धीरे -धीरे एक-एक करके सभी शिष्य आश्रम छोड़कर चले जाते है| 
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कई वर्ष उपरांत, आखिर वह घडी आ गयी जब भगवान राम माता सीता कि खोज में वन वन भटकते हुवे साधारण मानव के रूप में माता शबरी के आश्रम में आते है | भगवान को अपने सम्मुख देखकर शबरी आत्म विभोर हो जाती है| उन्हें अपनी बूढी आखो पर विश्वास नहीं होता कि प्रभु उनके सम्मुख खड़े है| माता शबरी एक परम तपस्वनी थी उसने अपने योग 
भगवान राम के चरण कमल 

शक्ति के द्वारा प्रभू को पहचान लेती है| तथा दण्डवत चरणों में गिरकर लिपट जाती है|आसुवो कि धारा बहने लगती है| भगवान माता कि इस करुना भरी प्रेम से आत्म विभोर हो जाते है| 
माता शबरी

माता शबरी भगवान राम को उचे आशन में बैठाती है| भगवान के आने कि ख़ुशी में शबरी अपनी शुध-बुध खो देती है| और भगवान का स्वागत सत्कार करने मे लग जाती है।भगवान को भूख लगी होगी कहके फल खिलाने को लाती है|मगर संजोग वस् उस समय मात्र बेर का ही फल उसके पास रहती है ,उसी को ही भगवान को खाने को देती है| 
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तभी अचानक विचार करती है कि कही ये बेर खट्टे ना हो और सहज भाव से मीठे बेर चयन करने के उद्देश्य से बेर को चख चख कर मीठे- मीठे बेर प्रभु को अपने हातो से खिलाती है| प्रभु उसके निश्छल प्रेम भाव से दिए फल ग्रहण कर आत्म विभोर हो जाते है, और आखो से अश्रु कि धारा निकलने लगती है| प्रेम भक्ति का श्रेष्ट उदहारण शबरी के इस प्रसंग को माना जाता है| 
प्राचीन विष्णु मूर्ति शिवरीनारायण

भगवान राम ने माता को आशीर्वाद स्वरुप नवधा ( नव प्रकार कि भक्ति मार्ग )सबरी को प्रदान करती है|, ये नव प्रकार कि भक्ति मोक्ष का मार्ग प्रसस्त करती है| शबरी ये ज्ञान पाकर धन्य हो जाती है| 
शिवरीनारायण

आश्रम से प्रस्थान करते वक्त भगवान श्री राम के द्वारा शबरी से सीता जी के बारे में पूछती है|तब सबरी श्री राम को पम्पा सरोवर जाने को कहती है| जहा पर उसकी मित्रता सुग्रीव से होगी और माता सीता कि खोज में सहायता करेगी ऐसा बोलकर भगवान के चरणों में गिरकर बार बार प्रणाम कर ,योग अग्नि के द्वार अपनी देह का त्याग कर देती है| राम उनको परम गति प्रदान करते है| 
Shivrinarayan Mandir Shivrinarayan

जिस कारण इस क्षेत्र को माता शबरी की कर्म भूमि कहा जाता है।जिस कारण शिवरीनारायण धाम का माहत्म्य और बढ़ जाता है| आज भी छत्तीसगढ़ में शर्वर अथवा शबर जनजाति के लोग रहते है| जो माता शबरी को अपना वंशज मानते है| और उसकी पूजा अर्चना करते है| इसी आस्था स्वरुप इस क्षेत्र में अनेक मंदिर का निर्माण कराया गया है| 
शिवरीनारायण के प्रमुख मंदिर निम्न है।
नर नारायण मंदिर शिवरीनारायण(Nar Narayan Temple Sheorinarayan)
लगभग 12 सदी ईसवी में निर्मित इस प्राचीन मंदिर का निर्माण राजा शबर के द्वारा करवाया गया था। इस मंदिर में एक कुंड है
Lord narayan Shivrinarayan
भगवान नर नारायण शिवरीनारायण
जिसे रोहाणी कुंड कहा जाता है|जो जमीन से ऊपर है। जिसमें हमेशा जल भरा रहता है,और भगवान राम के चरण उसमे डूबे रहते है।इस जल को अक्षय जल कहा जाता है। भगवान की इस दिव्य स्वरूप के दर्शन मात्र से मोक्ष की प्राप्ति होती है। मंदिर काफी भव्य है| मंदिर का शिखर काफी उची है| मंदिर के अन्दर महीन से महीन नक्काशी किया गया है| मंदिर के मंडप के बायीं ओर भगवान लक्ष्मीनारायण कि एक प्राचीन प्रतिमा रखी गयी जो खुदाई से प्राप्त हुआ है| मूर्ति के चारो ओर विष्णु के दशावतार का सूक्ष्म चित्रांकन किया गया है| प्रवेश द्वार पर दण्ड ,चवर लिए विष्णु के द्वारपाल ,विष्णु के पार्षद शंख पुष्प लिए चक्रपुरुष खड़े है| यहाँ पर गंगा जमुना सरस्वती एवं प्रवेश द्वार पर लघु गणेश कि प्रतिमा उकेरी गयी है| 
केशव नारायण मंदिर (keshav narayan temple Shivrinarayan)

keshav narayan Mandir Shivrinarayan
keshav narayan temple Sheorinarayan
बारहवी शताब्दी में निर्मित ,यह मंदिर ,नर नारायण मंदिर के ठीक सामने है| गर्भ गृह में भगवान विष्णु कि भव्य प्रतिमा विराजमान है| भगवान के पैर के पास जिस स्त्री का चित्रांकन किया गया है| वह भक्त माता शबरी कि प्रतिमा है| 
चन्द्रचूड महादेव मंदिर (Chandrachud Mahadev Temple)


Chandrachud Mahadev Mandir
Chandrachud Mahadev Temple
श्री नर नारायण मंदिर के निकट शिव जी का प्राचीन मंदिर है|जिसे चन्द्रचुड महादेव कहा जाता है| इस मंदिर के अन्दर अनेक मुर्तिया विद्यमान है| साथ ही कलचुरी कालीन शिलालेख भी प्राप्त किया गया है| 
मंदिर के प्रांगन में भगवान के चरण चिन्ह है| और एक प्राचीन कुवा है | कुछ मंदिर देखरेख के आभाव में द्वस्त होते जा रहे है| मंदिर का आस पास का क्षेत्र अतिक्रमण का शिकार हो गया है| 
जगन्नाथ मंदिर शिवरीनारायण (jagannath Temple Shivrinarayan)

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इस मंदिर का निर्माण सन 1927 में मुख्य मंदिर के कुछ कदम कि दुरी पर पूरी के जगन्नाथ मंदिर के सामान बनाया गया है| यहा पर रथ यात्रा बढ़ी ही हर्ष उल्लास के साथ मनाया जाता है| जिसमे भगवान का रथ खीचने के लिए लोग दूर- दूर से आते है| इसे भगवान जगन्नाथ का मूल निवास माना गया है| 
मंदिर प्रांगन में अनोखा वट वृक्ष (Unique tree Shivrinarayan)


Vat tree Shivnarayan
Vat tree Shivnarayan
इस वट वृक्ष कि खासियत यह है कि, इसकी जो पत्ते है वो दोने के सामान आक्रति वाले होते है| जनश्रुति कि माने तो, माता सबरी ने इसी पेड़ के पत्ते तोड़कर दोने का निर्माण कर भगवान राम को “<बेर फल”> खिलाया था| तब से इस पेड़ के पत्ते दोने के आकर के होते है| ऐसा पेड़ पूरी दुनिया में कही और देखने को नहीं मिलेगा| लोग इस वृक्ष कि बड़ी ही आदर भाव से पूजा अर्चना करते है|व माता शबरी का उनकी बीच होने का अनुभव महसूस करते है| इस पेड़ को कृष्णवट, माखन कटोरी वृक्ष के नाम से संबोधित करते है| वृक्ष के बगल में एक मंदिर में गुरुवो कि चरण पादुका को बड़े ही आदर भाव से रखा गाया ही |भक्त इसकी पूजा करते है| मंदिर प्रांगन में माता शबरी का भगवान को बेर खीलाते हुवे निर्माधिन प्रतिमा का निर्माण करवाया गया है| 



शिवरीनारायण से ३ किलोमीटर कि दुरी पर खरौद नामक ग्राम में शबरी माता का मंदिर विद्यमान है| यह मंदिर सिरपुर के लक्ष्मन मंदिर के सामान इटो से बनाया गया है ,जो राज्य सरकार द्वारा संरक्षित मंदिर है| यही पर लक्ष्मनेश्वर महादेव मंदिर है| साथ ही प्राचीन इंदल (इंद्र देव )का मंदिर है| जो देखने लायक स्थल है | 
शिवरीनारायण का भव्य मेला (Grand fair of shivarinarayan)
मंदिर परिसर पर हर वर्ष महाशिवरात्रि और माघ पूर्णिमा को भव्य मेले का आयोजन किया जाता है|जिसमे लाखो कि संख्या में जन सैलाब उमड़ता है| यह छत्तीसगढ़ का प्रसिद्ध माघी मेला माना जाता है| 


कैसे पहुचे: –राजधानी रायपुर से इसकी दुरी 178 कि .मी .है | व बिलासपुर से इसकी दुरी 60 किलोमीटर है| रास्ते पक्की बनी हुई है| आस पास के सहरो से मोटर बस भी चलती रहती है| शबरी नारायण में ठहरने के लिए कई धर्मशाला बनी हुई है| व प्रतिदिन निशुल्क भंडारे का आयोजन किया जाता है|इस मंदिर समिति द्वारा गौशाला का संचालन किया जाता है,और इसकी खासियत यहा है, कि किसी भी गाय का दूध नहीं निकाला जाता है| शबरीनारायण से कुछ दुरी पर हनुमान जी का मंदिर है| उस स्थान को जनक पुर कहते है| नदी कि उस पार वट वृक्ष है जिसे विश्राम वट (विधौरी )के नाम से जाना जाता है| इस वृक्ष के निचे भगवान के चरण पादुका रखी गई है| यही भगवान राम ने विश्राम किया उसके पश्चात इस आश्रम में प्रवेश किया|
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Thursday, October 24, 2019

Shabri Mata Mandir Kharod ( शबरी माता मंदिर – खरौद )


Ancient Shabri Mata Temple Kharod
खरौद एक प्राचीन नगरी है| यहाँ पर अनेको प्राचीन मंदिर विद्यमान है|इनमे से सबसे प्राचीन लक्ष्मनेश्वर महादेव मंदिर को माना गया है|
Shabri Mata Mandir
शबरी माता मंदिर – खरौद

इस शिवलिंग में एक लाख छिद्र है|जिसकी स्थापना त्रेता युग में,वनवास काल के दौरान भगवान लक्ष्मण ने किया गया था| इसे खर और दूषण नाम के दो दैत्यों कि नगरी कहा जाता है| जिसके कारण इस नगर का नाम खरौद पड़ा|
Shabri Mata Temple Chhattisgarh
Shabri Mata Mandir Kharod

भक्त माता शबरी कि प्रतिमा शिवरीनारायण के केशव नारायण मंदिर में स्थापिंत है| इसके आलावा खरौद ग्राम में जो कि शिवरीनारायण से 03 किलोमीटर कि दुरी पर है| यहाँ पर प्राचीन शबरी माता का मंदिर है| इस मंदिर का निर्माण कौन सी शताब्दी में हुवा है इसकी जानकारी नही है| मगर कुछ लोग इसे शिरपुर के लक्ष्मण मंदिर के समकालीन आस पास मानते है|




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मंदिर वर्गाकार उचे पत्तर के चबूतरे पर बना हुवा है|मंदिर का निर्माण लाल इटो के द्वारा किया गया है| सामने का जो भाग है|वह पत्थरो से बना है| ऊपर का भाग नष्ट गया है| गर्भ गृह पर माता शबरी कि प्रतिमा विराजमान है| गर्भ गृह के प्रवेश द्वार पर भगवान के द्वार पाल  का चित्रांकन किया गया है|साथ कि कई अन्य प्रकार कि बेल बुटो वाले आकृति  से प्रवेश द्वार को सजाया गया है| मंदिर में बेहद उन्नत किस्म कि नक्काशी देखि जा सकती है|मंदिर के बरामदे पर कुछ खण्डित प्रतिमा रखी गयी है|
Mata Shabri Mandir
Shabri Mata Temple

मंदिर का संरक्षण पुरातत्व विभाग द्वारा किया जा रहा है| पुरे परिसर में पर्यटकों के बैठने के लिए गार्डन का निर्माण कराया गया है| मंदिर को चारो तरफ से लोहे के एंगल द्वारा सुरक्षित किया गया है| जिसमे दो प्रवेश द्वार है| मंदिर प्राचीन तालाब के किनारे पर है| व तालाब में बीच में एक स्तम्भ है जिसमे एक छोटा सा मन्दिर बना हुवा है|जो पूरी तरह से पत्थर के स्तम्भ के सहारे टिका हुवा है| तालाब के मेड पर पत्थरों से निर्मित मंदिर है| जो एकदम जर्जर अवस्था में है| रोड के किनारे पर तालाब में मेड पर अनेको शिव मंदिर है|जो देख रेख के आभाव से एकदम खंडहर के सामान प्रतीत होता है|  

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Saturday, October 19, 2019

Lakshmaneshwar Mahadev Temple Kharod ( लक्ष्मणेश्वर महादेव मंदिर खरौद )

छत्तीसगढ़ कि इस पावन धरा में ऐसे अनेको तीर्थ स्थल जो रहस्य से भरा पड़ा है| उसी में से एक तीर्थ स्थल है|
Lakshmaneshwar Mahadev Mandir Kharod
लक्ष्मणेश्वर महादेव मंदिर- खरौद
Lakshmaneshwar Mahadev Temple, Kharod ,Janjgir Champa-Chhattisgarh 
जिसे खरौद कहा जाता है|यह एक प्राचीन और ऐतिहासिक नगरी है | खरौद को छत्तीसगढ़ का काशी कहा गया है| यह वह स्थान है जिसका सम्बन्ध भगवान राम से जुडा हुवा है| भगवान राम ने यही पर खर और दूषण नाम के दो दैत्यों संघार किया था| और लक्ष्मण के द्वार शिवलिंग कि स्थापना कि गयी थी| इस शिवलिंग में एक लाख छिद्र है| जिसमे एक लाख 
Lakshmaneshwar shivling
लक्ष्मणेश्वर महादेव


Kharod Mandir Chhattisgarh

छत्तीसगढ़ का काशी नगरी -खरौद 
शिवलिंग के दर्शन होते है|इस शिवलिंग में आप जीतन जल डालोगे वह अन्दर समा जाता है| और जितना निकालो ख़त्म नहीं होता है| लोगो कि मानो तो इस शिवलिंग का जो पानी है वह पाताल लोक में जाता है| लक्ष्मण के द्वारा स्थापित होने के कारण इसे लक्ष्मणेश्वर महादेव ,लखनेश्वर महादेव (""लक्ष लिंग "")के नाम से जाना जाता है|  
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Kharod


Lakshmaneshwar Mahadev Temple Kharod

सवा  लाख छिद्र वाला अनोखा शिवलिंग 
इस शिवलिंग में सवा लाख चावल के दाने अर्पण करने से सभी मनोकामना पूर्ण होती है| 
मंदिर के अन्दर दो शिलालेख है| गर्भ गृह से पहले दो स्तंभ है जिसमे| रामायण के कई प्रसंगों का चित्रांगन किया


 गया है| मंदिर उचे पत्थर के चबूतरे पर स्थित है| मंदिर परिसर पर अनेक प्राचीन मुर्तिया है| मंदिर परिसर पर वहा की पुजारी की वंशावली लिखी गयी है|  मंदिर के पीछे एक कुण्ड है|मान्यता है कि इसमें स्नान करने से सभी रोग दूर हो जाते है|सावन सोमवारी और महाशिवरात्रि में भारी जन सैलाब उमड़ता है| जिसमे अलग अलग क्षेत्र के लोग भगवान को जल अर्पण करने को आते है|यहाँ पर खर और दूषण कि नगरी होने के कारण इसे खरौद नगर कहा जाता है| यहाँ पर अनेक मंदिर है |तथा कई प्राचीन तालाब है| माता शबरी का प्राचीन मंदिर यही पर स्थित है| यह मंदिर संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग द्वार संरक्षित ईमारत है | 

कैसे पहुचे :- रायपुर से इसकी दुरी 119 किलोमीटर ,बिलासपुर से 62 कि.मी.,कसडोल से 29 किलोमीटर  और शिवरीनारायण से  02  किलोमीटर की दुरी पर स्थित  है|यह जांजगीर – चापा जिले के अन्दर आता है|नियमित रूप से बस ऑटो टैक्सी की सुविधा है| नजदीक ही निशुल्क शिवरीनारायण धर्म शाला है|   

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Friday, April 13, 2018

Ashtabhuji Devi Temple Adbhar { अष्टभुजी देवी मंदिर अड़भार, जिला - जांजगीर -चांपा }

अस्टभुजी देवी मंदिर अड़भार, जिला - जांजगीर -चांपा
प्राचीन नगर अड़भार में माँ अष्टभुजी देवी की दक्षिण मुखी प्रतिमा विराजमान है | पुरातत्व विभाग द्वारा
Adbhar Janjgir-Champa
Ashtabhuji Devi - Adbhar

सरक्षित है | पांचवी - छटवी शताब्दी के पूरा अवशेष मिलते है | इतिहास में अड़भार का उल्लेख अष्द्वार के रूप में मिलता है|
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कैसे पहुंचे इस प्राचीन मंदिर तक :- यह मंदिर जांजगीर -चांपा  जिले के शक्ति स्टेशन से ११ किलोमीटर दक्षिण -पूर्व की ओर स्थित है | नियमित रूप से बस ऑटो चलती रहती है |   

Monday, July 31, 2017

Nathal Dai Temple Chandarpur - Chandrahasini नाथल दाई मन्दिर चन्द्रपुर

नाथल  दाई मन्दिर  टिमरलगा -चन्द्रपुर ,चंद्रहासिनी  मंदिर के समीप में ही  है  यह मंदिर महानदी के तट  पर  दो नदियों के संगम पर स्थित है |  कहते है की यदि कोई भक्त नाथल  दाई  के दर्सन  करने मात्र से ही उसके सभी पाप नष्ट  हो जाते है | इसलिए इसे  इसे सिद्ध शक्ति पीठ भी कहा जाता है यहाँ पर बाकि दिनों की अपेक्षा नवरात्रि में भारी  भीड़ देखि जाती है यहाँ पर माता के दर्शन के लिए दूर - दूर से भक्त जण  भारी मात्रा में आते है | 
Nathal Dai Mandir
नाथल दाई 

मुख्य द्वार 

Nathal Dai Mandir
नाथल दाई  मन्दिर

महानदी : नौका  विहार 

यही मंदिर के समीप प्रथम दर्शन भोले बाबा के होती है उसके बाद माता के दरबार  में भक्त जाते है  , यहा  शिव मंदिर पर श्रावण सोमवारी व महाशिवरात्रि पर भारी  मात्रा में भोले बाबा को जल अभिषेक करने के लिए भक्त जन  आते  है |   
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Sunday, July 30, 2017

Raigarh Ka Baba Satyanarayan - Kosamnara (सत्यनारायण बाबा रायगढ़ छत्तीसगढ़)


अवतारी पुरूष महान तपस्वी श्री श्री बाबा सत्यनारायण जी ने (देवरी) डूमरपाली ग्राम के मध्यवर्गीय कृषक परिवार में 12 जुलाई सन् 1984 को पिता श्री दयानिधि, माता श्रीमती हसंमती साहू के घर पुत्र रूप में जन्म लिया। 
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Satyanarayan Baba  Raigarh Chhattisgarh

बाबा का नाम हलधर रखा गया। परंतु बाबा के पिता इन्हे सत्यम कहकर पुकारते थे। बाबा जी को बाल्यकाल से ही शिव स्वप्न में दर्शन देने लगे। जिसके बारे में बाबा अक्सर अपनी माँ एवं दादी को बताते थे। एक बार हलधर गाँव के ही शिव मंदिर में 7 दिन और 7 रात तक ध्यान लगाकर शिव उपासना में बैठ गए। उसके बाद बाबा निरंतर अपने ईष्ट देव में ही खोये रहे। शिव के प्रति उनकी आस्था देकखर गांव के बड़े बुढ़े एवं घर परिवार के लोगों ने उन्हे सत्यनारायण नाम दिया।

Raigarh Ka Baba Satyanarayan - Kosamnara
Raigarh Ka Baba Satyanarayan - Kosamnara 


बताया जाता है कि सत्यनारायण 16 फरवरी 1998 को आम दिनों की भांति घर से स्कूल जाने के लिए निकले थे पर स्कूल ना जाकर अपने ईष्ट देव का नाम जाप करने के लिए पूर्व में ईश्वर द्वारा निर्धारित उचित स्थान की तलाश में चल पड़े। पैतृक ग्राम (देवरी) डुमरपाली से 18 कि.मी. दूर कोसमनारा ग्राम के उजाड़ बयावान जगह पर तलाश पूरी हुई और सत्यनारायण ने यही पर अपनी तपस्थली बना डाली। उसी दिन एक पत्थर को शिवलिंग मानकर अपनी जिव्हा अर्पण कर तपस्या में लीन हो गए। लगभग एक सप्ताह बाद एक सेवक ने शिवलिंग के बगल में बाबा जी से आज्ञा लेकर अग्नि (धुनी) प्रज्जवलित कर दिया जो आज अखण्ड धुनि के रूप में निरंतर प्रज्जवलित है। आरंभ में बाबा जी की तपस्या को आम लोगों के द्वारा स्वीकार नहीं किया जा रहा था। कुछ लोगोंं द्वारा परेशान करने एवं बाबा जी को अपने स्थान से उठाने का प्रयास प्रशासन एवं कई लोगों द्वारा किया गया। बाबा जी की तपस्या को देखकर जहां परेशान करने वाले बढ़ रहे थे वहीं श्रद्धालु भक्तों की भी संख्या लगातार बढ़ रही थी। इसी को देखते हुए बाबा जी की 24 घंटा चौकसी होने लगी। बाबा जी के तपस्या की ख्याति धीरे-धीरे चारों ओर फैलने लगी। इसे देख सुनकर आसाम कामाख्या से श्री श्री 108 श्री मौनी कलाहारी बाबा (उम्र 108 वर्ष) भी कोसमनारा, रायगढ़ सत्यनारायण बाबा की तपस्या देखने आये। बाबा की तपस्या से प्रभावित होकर दिनांक 02.04.2003 से 08.04.2003 तक श्री श्री 108 श्री सत्य चण्डी महायज्ञ किया गया एवं बाबा सत्यनारायण जी को श्री श्री 108 की उपाधि देकर अपने स्व धाम को वापस हो गए। तब से आज तक प्रतिवर्ष उनके अनुयायी यहां कोसमनारा आते है।

भारी मात्रा में भक्त जन दर्शन करने आने लगे और मनवांछित फल पाने लगे। निर्माण शरू हुआ, प्रथम कुटिया बनी, फिर पानी की व्यवस्था हुई। धीरे-धीरे बाबा जी का धाम अपना स्वरूप लेने लगा। पत्थरों की जगह शिवलिंग की स्थापना हो गई। धुनि की जगह हवन कुण्ड बना दिया गया। बाबा जी खेत की जमीन पर बैठे थे। भक्तों के अनुरोध पर चबूतरा पर बैठने को राजी हुए। जगत जननी अष्टभूजी दुर्गा माता मंदिर का निर्माण 2009 में पूर्ण हुआ।

खुले आसमान के नीचे साधना करते हैं बाबा जी
बाबा जी 16 फरवरी 1998 से अब तक तीनों मौसम ग्रीष्म, वर्षा एवं ठंड ऋतु में खुले आसमान के नीचे निरंतर सुबह 7.00 से रात्रि 12.00 बजे तक अपने ईश्वर की साधना में तपस्यारत रहते है। बाबा जी किसी भी भक्तजन से वार्तालाप नहीं करते। बाबा जी प्रतिदिन सुबह 6 से 7 बजे एवं रात्रि 12:30 बजे 2 बजे तक आने वाले सभी भक्तों से मुलाकात करते है और बाबा जी अपनी बातों को भक्तों से ईशारे से कहते है। शनिवार को बाबा जी अपने भक्तों से रात्रि 12:30 से सुबह 5 बजे तक मिलते है।


कैसे पहुंचे :- यह  बाबा का धाम चंद्रहासिनि मंदिर से लगभग ३० कि.मी  की दुरी पर  रायगढ़ के कोसमनारा ग्राम पर स्थित है|