Sunday, February 19, 2017

Raja Mordhwaj ki Nagri Arang (राजा मोरध्वज आरंग)

इसी स्थान पर भगवान कृष्ण ने अर्जुण का घमण्ड तोडा था । और अपने परम भक्त मोरजध्वज की परीक्षा ली थी|

एक बार अर्जुन को अपने कृष्ण के सर्वश्रेस्ठ भक्त होने का घमंड हो गया था और वह सोचता है कि कृष्ण ने मेरा रथ चलाया ,सारथी बना | और मेरा हर कदम में मेरा साथ दिया है| इसलिए मै कृष्ण का एक मात्र परम भक्त हु |पर भगवान कृष्ण को तो आप जानते हो वह अपने भक्त का अभिमान (घमंड ) दूर करने और सही रास्ते में लाने के लिए क्या-क्या लीला करते है और उसकी अभिमान का मर्दन करते है और सही रास्ते में लाते है | और अपने सच्चे भक्त का मान बढ़ा देता है |
bhand deval


एक दिन कृष्ण और अर्जुन साधू का वेश धारण करके और अपने साथ एक शेर को ले जाकर राजा मोरजध्वज के राजमहल के द्वार में आते है| जब राजा को ये बात पता चलती है कि उसके द्वार पर दो साधू आये है जो राजा उसके सम्मान में दौड़ कर जाते है | क्युकी राजा परम दानी था और विष्णु भक्त था राजा अपने द्वार पर आये अतिथि को खाली हात नही लौटते थे ) तब राजा ने अतिथि का सम्मान किया और और आग्रह किया कि आप मेरे महल में चलो और भोजन करने का आग्रह करता है|

MORDHWAJ
राजा मोरजध्वज 

तब साधू बोलते है कि हमारी कुछ सर्ते है यदि तुम उन सर्तो को मानते हो तो हम तुम्हारे यहाँ जरुर भोजन करेंगे | राजा ने उस साधू कि सभी सर्तो को मान लिया | तब साधू बोला कि हम तो ब्राम्हण है| हमें कुछ भी खिला दो मगर ये जो शेर है वह नर भक्षी है | यदि तुम अपने पुत्र को आरी से काटकर शेर को खिलावोगे तो तभी हम तुम्हारे यहाँ भोजन करेंगे | कृष्ण कि यह बात सुनकर राजा और अर्जुन के होष उड़ जाते है | फिर भी राजा अपना आतिथ्य धर्म नहीं तोड़ना चाहता था तब उसने भगवान से कहा कि प्रभु मुझे मंजूर है पर एक ब़ार मै अपनी पत्नी से से पूछलू तब भगवान से आज्ञा पाकर राजा उदास चेहरा लिये रानी के पास जाते है रानी उदास चेहरा देख कर पुछता है कि क्या बात है स्वामी क्या हुवा है आपकी ये दसा कैसे बना लिया है तब राजा सभी बात को रानी को बताते है रानी कि आखो से अश्रु कि धार फुट पड़ती है परन्तु रानी एक पति व्रता नारी थी वह राजा कि इस दशा को देख नही सकती है |और कहती है कि स्वामी कोई बात नही है आप अपना वचन निभावो आप कि आन पे तो हमारे लाखो पुत्र कुर्बान आप जाके साधू को अन्दर ले आएये ( राजा मन ही मन सोचता है कि ऐसी पत्नी धन्य है जो पति कि मान कि खातिर अपने प्यारे पुत्र को हस्ते हस्ते बलि दे दे)
तभी अर्जुन के मन में ये बात चल रही है कि प्रभु ने ऐशा क्यों किया | तब प्रभु से बोला कि प्रभु ये आप क्या कर रहे है आप ने राजा से ये क्या माग लिया तब कृष्ण बोला अभी तुम शांत रहो और बस देखते जावो 
तब राजा तीनो को अन्दर ले जाते है और और भोजन कि तैयारी में जुट जाते है भगवान को 56 भोग दिया गया मगर अर्जुन से भोजन गले से नहीं उतर रहा था तब शेर को खिलाने के लिए राजा अपने पुत्र को लाता है राजा का पुत्र 6 वर्ष का था और वह अपने माता पिता का परम भक्त था उसने भी हसते हसते अपने प्राण दे दिए एक उफ़ तक नहीं बोला ( ऐसे पुत्र पाकर माता पिता धन्य हो गए और पूरी दुनिया के लिए मिशाल कायम किया ) तब राजा ने अपने हातो से उसपर आरी चला कर उसको फाड़ा ( उसके बिच से दो टुकड़े किये ) और शेर को परोसा गया तब भगवान ने भोजन ग्रहण किया तब रानी ने अपने पुत्र के दो हिस्से देखा तो वो रो पड़ी तब भगवान ने इस बात पर गुस्सा कर गए कि लड़के का एक फड़ कैसे बच गया (जबकि राजा ने दोनों हिस्से शेर को दिये थे ) भगवान रुष्ट होकर जाने लगते है | तब राजा रानी ने उसके चरण पकड़ लिये ... अब अर्जुन का घमंड चूर चूर हो चूका था अब अर्जुन भगवान के चरणों में गिर गए और बिलक –बिलक कर रोने लगे और बोला आपने मेरा घमंड तोड़ने के लिए उसके पुत्र को उसी के हाथो मरवा दिया और अब आप रुष्ट हो कर जा रहे हो प्रभु ये कहा का न्याय है |प्रभु आप मुझे क्षमा करने कि कृपा करे प्रभु आप तो करुना निधाण है| और अपने परम भक्त मोरजध्वज का कल्याण करो और उसका दुःख दूर करो पुरे दरबार ने यह घटना देखि पुरे दरबार में सन्नाटा छाया हुवा था | तब भगवान कृष्ण अर्जुन का घमंड टुटा जानकर शान्त हो जाते है| तब भगवान ने रानी से बोला कि अपने पुत्र को आवाज दो ... रानी ने सोचा कि मेरा पुत्र तो मर गया है | अब इसका क्या मतलब .फिर भी साधू कि आज्ञा मानकर अपने पुत्र रतन कंवर को आवाज देती है| तबी उसी समय यह चमत्कार हुवा उसका पुत्र जीवित हो जाता है और हस्ते हस्ते अपने माँ के आचल में लिपट जाता है 
तभी उसी समय भगवान राजा – रानी से प्रसन्न होकर अपना वास्तविक चतुर्भुज रूप में प्रगट हो जाते है| दरबार में भगवान कृष्ण कि जय -जय कार से महल गुज उठता है |और देव लोक से सभी देव राजा मोरजध्वज कि नगरी में आते है और उनकी भक्ति का गुणगान करती है और उसको आशीर्वाद देती है| राजा मोरजध्वज भगवान के दर्शन पाकर अपनी भक्ति सार्थक जानकर मोरजध्वज कि आखे भर जाती है | तब भगवान ने वरदान मागने को कहा | तब राजा - रानी ने वरदान मागा और बोला कि प्रभु आप कभी भी इतनी कठोर परीक्षा अपने भक्तो कि ना ले जिस तरह आपने हमारी ली | बस यही वरदान दो कि हम सदा ही आपकी भक्ति में लीन रहे भगवान ने ऐशा वरदान सुनकर प्रसन्न हुवा और उसको सदा सदा के लिए अपना परम भक्त होने का वरदान देते है | 

इन्हें भी देखे :-

Bhand Deval Temple Arang (भाण्ड देवल बाघ देवल मंदिर आरंग)

रायपुर से संबलपुर जाने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग  क्रमांक ६ पर रायपुर से ३६ कि.मी  दूरी पर आरंग स्थित है जो रायपुर जिले में आता है| 
Bhand Deval Arang
भाण्ड देवल मंदिर

 आरंग एक प्राचीन नगरी है|  इसकी प्राचीनता वहा पर स्थित अति प्राचीन  मंदिरों मूर्तियों ,मंदिरों में महीन नक्कासी और ताम्रपत्र अभिलेखों  से मालूम होती है| आरंग महाभारत कालीन महान धर्म निष्ठ राजा  मोरजध्वज  कि नगरी थी| उसने अपने साशन काल में अनेक मंदिर का निर्माण कराया था जिसके अवसेश अभी भी मिलती है |
वैसे तो आरंग में अनेक मंदिर है| पर सबसे ज्यादा शिवलिंग को देखा जा सकता है  उसमे से मुख्य रूप से मंदिर   ( भाण्ड देवल मंदिर ,बाघ देवल मंदिर ,महामाया माता मंदिर ,चंडी  महेश्वरी  मंदिर पंचमुखी महादेव और पंचमुखी हनुमान मंदिर मुख्य रूप से है )
इनमे से सबसे प्राचीन  ( भाण्ड देवल मंदिर को कहा जा सकता है ) इसका निर्माण  मंदिर परिसर पर पुरातत्विक विभाग द्वारा लगाये सूचना से मिलती है| सूचना के अनुसार

Bhand Deval Jain temple

यह मंदिर भाण्ड देवल नाम  से विख्यात  यह मंदिर जैन धर्म को समर्पित है|  मंदिर के गर्भ गृह  में तीन तीर्थकार कि अति सुंदर चमक दार  कायोत्सर्ग मुद्रा वाली प्रतीमाये अधिष्ठित  है| यह मंदिर पश्चिम मुखी  मंदिर उची जगती पर निर्मित है| तथा  आधार  विन्यास  में  पंचरथाकार है| नागरशैली में निर्मित  इस मंदिर के मण्डप  एवं  मुख मंडल  का आधार से उपर का भाग विनष्ट  हो चूका है मंदिर कि बाह  भित्ति अधिष्ठित से लेकर आमलक तक  उरूश्रृंगो  व कुलिकाओ से अलंकृत  है| जिसमे जैन  तीर्थकार   यक्ष - यक्षिणी व देव प्रतिमाये  के अतिरिक्त अलिंगनरत ,मिथुन  मूर्तियों का भी उत्कीर्णन  किया गया है| अधिष्ठान  भाग कि सज्जा  पांच पट्टिकाओ  हंसवाली ,नृत्य -संगीत के दृश्य,कीर्तिमुख एवम  ज्यामिति अभीप्राय के अंकनो  से  युक्त  है| कला कि दृष्टी से इसको 9 वी  शती ई में (हैयत वंशीय)  शासको द्वारा   निर्मित माना  जाता है |
बागेश्वर नाथ महादेव मंदिर को सिद्ध पीठ भी कहा जाता है| 
Bagha deval Arang
बागेश्वर नाथ महादेव मंदिर 

इसकी भी बनावट भी अद्वतीय है| मंदिर के चारो तरफ चट्टानों से उची  घेरा किया गया और द्वार के सामने शेर कि प्रतिमा और अनेक मुर्तिया है| मंदिर में एक अति प्राचीन कुवा है और मंदिर के सामने हनुमान जी का मंदिर है|    

mahamaya Arang


            

Arang
इसी स्थान पर भगवान कृष्ण ने अर्जुण का घमण्ड तोडा था।  और  अपने परम भक्त मोरजध्वज की  परीक्षा ली  थी यहाँ पर राजा मोरजध्वज ने अपने पुत्र को आरी से काटकर भगवान श्री कृष्ण  के शेर को खिलाया था। और  भगवान  ने उसकी सच्ची अतिथि भक्ति तथा अपने वचन पर कायम रहने के कारन उसको वरदान दिया था जिस कारण  यह स्थान परम तीर्थ बन गया